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हे परिजनो छप्पन भोग नही मुक्ति दिला दो-----बस हमारे फूल सिरा दो

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फोटो-20,21,22
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पितर राह देख रहे, फूल सिराने आ जाओ
-मुक्ति मांग रहीं शमशान की पोटलियों में बंद अस्थियां
कॉमन इंट्रो--
मानो तो गंगा मां हूं, न मानो तो बहता पानी, हमारी सारी परंपराएं इसी तर्क पर टिकीं हैं। यदि पितरों के प्रति आपके दिलों में सम्मान है, प्यार है, तभी श्रद्घा के मायने हैं, वरना सिर्फ रीति रस्में हैं। धार्मिक कथा में महर्षि भागीरथ ने पितरों की मुक्ति के लिए मां गंगा को पृथ्वी पर बुलाया था, यदि पितरों के श्राद्घ परंपरा में वाकई सच्चाई है तो सैकड़ों पितरों की आत्मा तड़प रही होगी, क्योकि परिजन उनकी अस्थियां यानी फूल चुनकर गंगा जी में प्रवाहित करने के बजाय शमशान की पोटलियों में छोड़ आए हैं। मान्यता है कि पितृ पक्ष में पितर भवलोक में आकर परिजनों से पसंद के भोग स्वीकार करते हैं। श्रद्घा भाव देखकर पितरों की आत्मा तृप्त होती है और आशीर्वाद देती है और अगला जन्म लेती है। यदि ऐसा होता होगा तो अपने परिजनों से पकवानों की बजाय पितर एक ही इच्छा जताते होगें- ये शमशान की पोटलियों में मिट्टी फांक रहे, उनके फूल गंगा जी में प्रवाहित करके मुक्ति दिला दो।
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अमर उजाला ब्यूरो
बदायूं। पितृ पक्ष में पितरों का श्राद्घ कर तर्पण करने की परंपरा है। लोग इस परंपरा का पालन कर अपने पितरों का स्मरण भी कर रहे हैं, लेकिन सैंकड़ों ऐसे परिवार है कि जो अपने घर के बुजुर्ग की मौत होने के बाद जैसे-तैसे शमशान गृह जाकर उनका अंतिम संस्कार तो कर आए लेकिन बाद में उनके फूल यानी अस्थियों को चुनने ही नहीं गए। ऐसे में असंख्यों लोगों के फूलों को गंगा, गया, प्रयाग या अन्य तीर्थ स्थल पर ले जाकर सिराया ही नहीं गया है। शहर के शमशान गृह और कुछ मंदिरों में तमाम लोगों की चिता के चुने हुए फूल मटकी में लटके हैं, जिनके परिवार वाले उन्हें लेने नहीं आए, ऐसे फूलों को शमशान गृह प्रबंधन ने स्वयं ही चुनकर बरामदे या पेड़ के नीचे मटकी में भर कर टांग रखा है।
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सनातन धर्म में मान्यता है कि दाह संस्कार के बाद मृत आत्मा को तब तक मोक्ष नही मिलता जब तक उनके फूल चिता से चुनकर प्रवाहित न किए जाएं। दाह संस्कार के बाद परिवार के सदस्य चिता से फूल के रूप में शव की जली राख चुनते हैं, फिर उन्हें मिट्टी के बर्तन में भर कर तीर्थ स्थल पर ले जाकर प्रवाहित कर पितरों का तर्पण करते है लेकिन आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में बेटे बेटियों के पास इतना समय नहीं है कि वे अपने मां बाप या किसी अन्य बुजुर्ग की चिता पर जाकर उसके फूल चुने और उनको तीर्थ स्थल पर ले जाकर सिरा दें। आज तो दाह संस्कार दसवां या तेरहवीं के बाद ही घर के बुजुर्ग के प्रति अपने कर्तव्यों की इति श्री समझा ली जाती है और कई लोग अपनों की चिता पर फूल चुनने हीं नहीं जाते। परिवार या पड़ोस में कोई याद भी दिला दे तो शमशान गृह प्रबंधन को ही फोन करके कहते हैं कि प्रवाहित कर तर्पण कर दें, उसका खर्च उठा लेगें यह काम माता पिता या परिवार के अन्य बुजुर्ग के प्रति श्रद्घा से नही बल्कि एक बोझ समझ कर करते हैं। ऐसे में, तर्पण की परंपरा दरकती नजर आने लगी है। वैसे, शमशान भूमि पर एक-डेढ़ साल तक जिन फूलों को लेने कोई नही आता है, अगले साल शमशान गृह प्रबंधन खुद ही उन फूलों को हरिद्वार या गंगा घाट पर प्रवाहित कर देते हैं लेकिन अपनों के हाथों उन्हें सिराने और तर्पण की सनातनी परंपरा आज के समय में गहरी नहीं रह गई है।
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केस एक---
फूल प्रवाहित करा दो पेमेंट कर देंगे
कुछ महीने पहले शहर के एक बड़े परिवार के बुजुर्ग की मौत होने पर शमशान घाट गृह में उनका अंतिम संस्कार किया गया। उन बुजुर्ग के बेटे विदेश में थे। दाह संस्कार के बाद फूल चुनने के लिए परिवार वाले नही आए, फोन गया तो बेटे ने कहा कि आप ही फूल चुन कर गंगा में प्रवाहित करा दो आपका जो भी पेमेंट होगा बैंक अकाउंट में भेजे दे रहा हूं।

केस दो-
शमशान भूमि में अपने बुजुर्गों का अंतिम संस्कार करके गए आधे से ज्यादा परिवार उनके फूल चुनने नहीं आए। इन फूलों को सामाजिक संस्था मटकी में भर कर रखवा देती हैं और एक-डेढ़ साल तक इंतजार करने के बाद उनको हरिद्वार या कछला गंगा घाट में प्रवाहित करा देती हैं। कई बार संस्था के लोगों ने फूल गंगा में प्रवाहित कराए हैं।
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फोटो- 23
मुक्ति धाम में दाह संस्कार होता है तो लोग दूसरे और तीसरे दिन फूल चुनकर ले जाते हैं। कुछ लोग नही ले जाते हैं तो उनके बुजुर्गों के फूलों को चुनकर एक-दो साल इंतजार के बाद गंगा में प्रवाहित करा दिया जाता है। चुने हुए फूलों को शहर के कई मंदिरों और दसवां संस्कार स्थल पर रखवा दिया जाता है।
-नरेंद्र दुआ, अध्यक्ष, पंजाबी समाज सेवा समिति
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