शहर से सटे बावट गांव के रहने वाले शमशेर शहर के एक निजी चिकित्सक के यहां अपनी बेटी का इलाज कराने आए थे। पेट दर्द से तड़प बेेटी को लेकर वह एक प्राइवेट डॉक्टर के यहां गए, लेकिन वहां कोई डॉक्टर नहीं मिला। स्टाफ ने बताया कि डॉक्टर हड़ताल पर हैं। इसके बाद शमशेर ने स्टाफ से बेटी को देखने की गुहार की, लेकिन स्टाफ ने मना कर दिया। इसके बाद वह सरकारी अस्पताल गए और बेेटी को दिखाया।
केस-दो
मूसाझाग के रामवीर की बेटी गुड़िया को उल्टी-दस्त आ रहे थे। रविवार रात से उसकी हालत खराब थी। रात में गांव के एक डॉक्टर को दिखाया तो कुछ राहत मिल गई। अगले ही दिन सोमवार को बालिका की हालत फिर बिगड़ गई। रामवीर आनन-फानन में बेटी को लेकर एक डॉक्टर के यहां गए, लेकिन उनके यहां कार्य बहिष्कार का बैनर टंगा था। रामवीर ने अंदर जाकर पूछा तो स्टाफ ने डॉक्टर के न होने की बात कही। रामवीर भी बेटी को जिला अस्पताल लेकर चले गए।
केस- तीन
इंद्राचौक के पास स्थित एक मैटरनिटी हॉस्पिटल में एक गांव के लोग पहुंचे और डॉक्टर के बारे में पूछा तो स्टाफ ने उन्हेें वहां से चले जाने को कह दिया। लोगों ने कारण पूछा तो स्टाफ ने उन्हेें वहां से भगा दिया। बेचारे तीमारदार मरीज को लेकर हॉस्पिटल से बाहर आ गए। इसके बाद भटकते हुए कहीं और चले गए।
बदायूं पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों के साथ हुई के बाद देश भर में हुए आंदोलन के तहत आईएमए के आह्वान पर सोमवार को निजी चिकित्सकों ने एक दिनी हड़ताल रखते हुए ओपीडी बंद रखीं। इस दौरान दिखाने आए मरीजों के साथ ये तो बानगी भर थी। डॉक्टरों की हड़ताल का खामियाजा मरीजों को परेशान होकर उठाना पड़ा। इस दौरान उनका स्टाफ भी क्लीनिक और अस्पतालों में बैठकर समय काटता रहा। किसी ने यह भी जरूरत नहीं समझी कि यदि कोई मरीज दूरदराज से आया है तो उसे सही से जवाब भी दे दिया जाए। कई अस्पतालों पर मरीजों और उनके तीमारदारों की अस्पताल स्टाफ से नोकझोंक भी देखने को मिली।
बोले मरीज-
कल से पेट में दर्द था। यहां डॉक्टर को दिखाने आया था, लेकिन डॉक्टर नहीं मिले। स्टाफ से पूछा तो उन्होंने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया।
नवेद खान, गभियाई
बेटे को दिखाने आया था लेकिन डॉक्टर नहीं मिले। स्टाफ ने ढंग से बताया तक नहीं। डॉक्टर तो धरती के भगवान कहे जाते हैं, लेकिन यहां तो उनका दूसरा रूप ही देखने को मिला।
इस्तिखार, नई सराय
भाई को दिल में दिक्कत थी। शहर के ही एक नर्सिंग होम में उसे लेकर आए लेकिन पता चला डॉक्टर हड़ताल पर हैं। वह तो गनीमत थी कि इमरजेंसी नहीं थी, नहीं तो मुश्किल हो जाती।
रक्षपाल, नेकपुर
सुबह से तबीयत खराब थी, दिखाने आए थे, लेकिन डॉक्टर नहीं मिले। स्टाफ कुछ बताने को तैयार नहीं है। कोई कुछ कह रहा था, कोई कुछ। कम से कम मरीजों के साथ व्यवहार तो ठीक रखना चाहिए।
रघुनंदन, चंदरोई
डॉक्टरों ने पहले किया विरोध प्रदर्शन, फिर पहुंचे डीएम को ज्ञापन देने
पश्चिम बंगाल में हुई घटना के बाद फैले आंदोलन के तहत सोमवार को जिले भर के निजी चिकित्सकों ने बदायूं क्लब में एकत्र होकर विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने सुबह से अपने-अपने अस्पताल व नर्सिंग होम बंद रखे। डीएम दिनेश कुमार सिंह को ज्ञापन देकर कार्रवाई की मांग की।
सोमवार सुबह आईएमए के सचिव डॉ. शरद कुमार गुप्ता, डॉ. बीएस नौगरिया, डॉ. डीवी शाक्य, डॉ. शरद गुप्ता, डॉ. वागीश वार्ष्णेय, डॉ. रश्मि अग्रवाल, डॉ. रुचि गुप्ता, डॉ. इत्तेहाद आलम आदि समेत अन्य चिकित्सकों ने बदायूं क्लब में एक मीटिंग की। वक्ताओं ने कहा कि लगातार चिकित्सकों पर हमलों की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। जहां देखो वहीं इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे में चिकित्सा व्यवस्था की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। चिकित्सकों को मरीजों का इलाज करना मुश्किल हो गया है। पश्चिम बंगाल में हुई घटना बेहद शर्मनाक रही। अगर पश्चिम बंगाल सरकार इस पर कार्रवाई करती, तो यह हालात पैदा न होते, मजबूरन ही हड़ताल करना पड़ी।
जिला अस्पताल में मरीजों की तादात बढ़ी
बदायूं। सोमवार सुबह से प्राइवेट हॉस्पिटल और नर्सिंग होम में ओपीडी बंद रहने से मरीजों को खासी दिक्कत उठानी पड़ी। इस कारण जिला अस्पताल में मरीजों की भीड़ उमड़ पड़ी, इससे वहां के पर्चा काउंटर से लेकर इमरजेंसी तक में मरीजों की भारी भीड़ रही।
प्राइवेट हॉस्पिटल और नर्सिंग होम में ओपीडी बंद रहने के कारण डॉक्टर बैठे ही नहीं, सिर्फ पहले से भर्ती मरीजों इलाज जारी रखा। हड़ताल की जानकारी पर मरीज जिला अस्पताल की ओर बढ़ गए। इससे जिला अस्पताल में मरीजों की संख्या अच्छी खासी हो गई। सुबह से लेकर दोपहर दो बजे तक अस्पताल की ओपीडी फुल रही। हालांकि जिला अस्पताल समेत सभी सरकारी अस्पतालों में ओपीडी जारी रखते हुए विरोध स्वरूप डॉक्टरों ने काली पट्टी बांधकर ही काम किया। विरोध करते हुए डॉ. उदयवीर सिंह ने कहा चिकित्सक चाहे सरकारी हो या प्राइवेट, मान सम्मान सभी का होता है। तोड़फोड़ और मारपीट की कई घटनाएं अस्पताल में हो चुकी हैं। दोबारा ऐसा न हो, इसके लिए सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। इस दौरान डॉ. कप्तान सिंह, डॉ. रियाज अंसारी, डॉ. एमए सिद्दीकी, डॉ. नितिन कुमार सिंह, डॉ. राजेश वर्मा, डॉ. गजेंद्र वर्मा आदि के अलावा अस्पताल के सभी चिकित्सक मौजूद रहे। वहीं जिले के सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मिलाजुला असर देखने को मिला। डॉक्टरों ने विरोध तो जताया लेकिन मरीजों के इलाज पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ने दिया।
यहां तो कई बार हो चुका है हंगामा
जिले के अधिकतर प्राइवेट हॉस्पिटल या नर्सिंग होम में किसी मरीज की मौत होने पर अक्सर बवाल हुए हैं। शहर के कई अस्पताल ऐसे हैं, जहां महिलाएं डिलीवरी के दौरान या बाद में दम तोड़ चुकी हैं। कई हॉस्पिटलों में जच्चा-बच्चा की मौत हो चुकी है। इस पर उन हॉस्पिटलों में जमकर हंगामा हुआ है। हाल में ही डॉ. बीआर गुप्ता के अस्पताल में एक मरीज की मौत हो गई थी, जिस पर परिजनों ने जमकर हंगामा किया था। हालांकि महिला की मौत डॉक्टरों की लापरवाही से हुई थी। उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई है। पांच-छह दिन पूर्व लीलावती अस्पताल में भी एक महिला की ऑपरेशन के दौरान मौत हो गई थी, जिसके बाद हंगामा होते-होते बचा था।
अबकी तो पश्चिम बंगाल में घटना हुई। यहां यूपी में और अपने जिले में कई घटनाएं हो चुकी हैं। इस पर सरकार को पहले सख्त कदम उठाना चाहिए था। सरकार ऐसे कानून बनाए ताकि चिकित्सकों के साथ ऐसे अमानवीय व्यवहार न हो और मारपीट, तोड़फोड़ जैसी घटनाएं न हों। -डॉ. शरद गुप्ता, अध्यक्ष, आईएमए