शहर के जिला अस्पताल की प्रशासनिक व्यवस्थाएं फेल हो चुकी हैं। यहां के हालात इतने खराब हैं कि अस्पताल में कौन से कार्य की किसकी जिम्मेदारी है। इसकी जानकारी तक किसी तो नहीं है। जिला अस्पताल कार्यालय में तैनात बाबुओं को अपने पटल का पता नहीं है। इसको लेकर शनिवार दोपहर उत्तर प्रदेश हेल्थ सिस्टम स्ट्रेंथनिंग प्रोजेक्ट (यूपीएचएसएसपी) लखनऊ की टीम के निरीक्षण के दौरान तीन बाबुओं में जमकर बहस हो गई। उन्होंने अस्पताल के कार्यों को एक-दूसरे पर टाल दिया। इस दौरान बाबुओं ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप भी लगाए।
वैसे तो जिला अस्पताल में 18 नियमित और 14 संविदा पर तैनात डॉक्टर हैं। तीन बाबू हैं और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की संख्या भी कम नहीं है। इनमें दो कर्मचारी तो ऐसे हैं, जो दिनभर नेतागिरी करते हैं। उन्हें न तो मरीजों से कोई मतलब है और न ही अपनी जिम्मेदारियों से। उनकी ड्यूटी कहीं होती है और वह बैठते कहीं हैं। जिला अस्पताल की यह व्यवस्थाएं कैसे खराब हुई और क्यों खराब हुईं, इस पर कभी अस्पताल प्रशासन ने गौर ही नहीं किया। परिणाम स्वरूप जिला अस्पताल में एक-एक करके कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिनसे जिला अस्पताल प्रशासन की बदनामी हुई और लापरवाही का दाग लगा। इसके बावजूद न तो अप्रत्याशित घटनाओं पर लगाम लगी और न ही कर्मचारियों में कोई सुुधार देखने को मिला।
शनिवार सुबह यूपीएचएसएसपी लखनऊ की तीन सदस्यीय टीम जिला अस्पताल पहुंची। इनमें असिस्टेंट डायरेक्टर डॉ. एके चौधरी, डॉ. धीरज तिवारी और अरुण जायसवाल शामिल थे। पहले तो उन्होंने जिला अस्पताल का निरीक्षण किया। ओपीडी से लेकर इमरजेंसी, वार्ड, गार्डन, पार्किंग, सफाई व्यवस्था, किचिन और ब्लड बैंक के हालात देखे। नए सुधार क्या हो सकता है, इस तरह की प्लानिंग की गई। अंत में उन्होंने सीएमएस कार्यालय में बैठकर डॉक्टर, कर्मचारियों, फार्मेसिस्ट, वार्ड ब्वाय आदि की संख्या मांगी। प्रभारी सीएमएस डॉ. सुकुमार अग्रवाल ने बताया कि डॉक्टर से लेकर कर्मचारियों का रिकार्ड बाबुओं के पास रहता है। इस पर तीनों बाबुओं को बुलाया गया। उनसे सूची मांगी गई, तो उन्होंने अपने-अपने हाथ खड़े कर दिए। उन्होंने सूची देने की जिम्मेदारी एक-दूसरे पर टालनी शुरू कर दी। एक कह रहा था कि मेरे पास चार्ज नहीं तो दूसरा कह रहा था कि मेरे पास नहीं है। इसके चलते बाहर से आई टीम को अधिक जानकारी मिल सकी।