बदायूं। मेरठ की क्रांति के बाद 15 मई 1857 को बदायूं में विद्रोह की चिंगारी भड़क गई थी। इसका सबसे पहले असर बिल्सी के बेहटा गुसांई गांव में दिखा। लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी। गुलडिया गांव में नमक कानून तोड़ा गया था। तब अंग्रेजों ने 14 क्रांतिकारियों को कलक्ट्रेट के पास बने फांसी घर पर फांसी दी थी। पोस्टमार्टम हाउस से पहले बने इस फांसी घर की जगह में आजादी के बाद शहीद पार्क बना दिया गया। जहां क्रांतिकारियों को फांसी दी गई उस कोठरी को अब जल्लाद कोठरी के नाम से जाना जाता है।
वर्तमान में कलक्ट्रेट में शहीद स्थल के पास ही एक जगह है, जहां अंग्रेजी हुकूमत के दौरान फांसी दिए जाने के बाद शहीदों को दफन किया जाता था। बताया जाता है कि उस समय इस जगह पर एक कुआं था। इसके पास ही एक इमली के पेड़ पर क्रांतिकारियों को फांसी दी जाती थी। इन दोनों जगह के बीच जल्लाद की कोठरी है। इसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि इसी कोठरी में जल्लाद रहता था। यहां 14 क्रांतिकारियों को फांसी दी गई थी। जिस कोठरी में फांसी दी जाती थी वहां जल्लाद दिन रात यहां रहता था। यह जल्लाद बदायूं में काफी चर्चित था। इसके मरने के बाद इस जगह का नाम जल्लाद कोठरी रख दिया गया। आज भी लोग इस जगह को जल्लाद की कोठरी के नाम से जानते हैं।
1921 व 1929 में बदायूं आए थे महात्मा गांधी
एक मार्च 1921 को महात्मा गांधी का आगमन बदायूं हुआ तो एक बार फिर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में जोश भर गया। 1921 में ही गांधी जी के असहयोग आंदोलन में बदायूं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1929 में महात्मा गांधी फिर बदायूं आए। 26 जनवरी 1930 का दिन बदायूं के इतिहास में पूर्ण स्वराज्य दिवस के रूप में दर्ज है। इस दिन एक सभा में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रघुवीर सहाय ने पूर्ण स्वराज पर एक घोषणा पत्र पढ़कर सुनाया। जून 1932 में अंग्रेजों ने सैकड़ों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को जेलों में ठूंस दिया। 1933 तक ये लोग फतेहगढ़ जेल में रहे। इस दौरान जिले में स्वतंत्रता आंदोलन कुछ कमजोर हुआ। 1941 में सत्याग्रह आंदोलन शुरू हुआ तो जिले में क्रांति की ज्वाला फिर धधक उठी। 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन ने क्रांतिकारियों में एक बार फिर जोश भर दिया। जंग बहादुर जौहरी, कुंवर रुकुम सिंह, चौधरी तुलसीराम, पंडित निरंजन लाल, चौधरी बदन सिंह, महेश्वर दयाल सक्सेना जैसे सैकड़ों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आंदोलन के कारण 1942 से 1945 के बीच अंग्रेजी सरकार के पैर उखड़ने लगे।
गुलड़िया में तोड़ा गया नमक कानून
जिले में नमक सत्याग्रह सबसे पहले गुलड़िया से शुरू हुआ। गुलड़िया में नमक कानून तोड़ने की सूचना पूरे जिले में फैल गई और जिले में जगह-जगह लोग नमक कानून को भंग करने लगे। दूसरे कई जिलों के लोग भी सत्याग्रह में हिस्सा लेने बदायूं पहुंचने लगे। गांव में नमक कानून तोड़ने के लिए विशेष इंतजाम किए गए थे। बताया जाता है कि नमक कानून भंग करते समय करीब 15 से 20 हजार लोग यहां मौजूद रहे।