जानवरों के लिए बिकता सामान।
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साहब आखिर पशु कैसे सजाएं ?
मेला ककोड़ा। मेले में पिछले साल नोटबंदी की मार दिखी थी तो इस बार जीएसटी लागू होने से उपजी परेशानी किसानों से लेकर व्यापारियों तक के चेहरों पर हावी थी। पशुओं को सजाने का बाजार काफी हद तक इसकी चपेट में था। यहां किसानों को महंगा सामान खरीदना पड़ा तो व्यापारी भी कम बिक्री से आहत थे।
ककोड़ा मेला ग्रामीण परिवेश का साल भर का सबसे बड़ा मेला होता है। लोग साल भर की जरूरत का सामान मेले से खरीदते हैं। इनमें पशुओं को सजाने का बाजार भी प्रमुखता से सजता है। इस बार भी बाजार लगा। इसमें भीड़ भी खूब रही पर दुकानदारों की मानें तो बिक्री इस बार कम रही। दुकानों पर किसान आए, भाव पूछा और चलते बने। बेहद जरूरत का सामान ही खरीदा। एटा से आए व्यापारी भवन सरन ने इसकी वजह जीएसटी बताई। उन्होंने बताया कि पशुओं के गले की बेल्ट, घोड़ों की जीन और काठी, घोड़ों की एक आंख पर लगाने वाला नजरबंद से लेकर बैलों को सजाने की कई चीजें चमड़े से बनी होती हैं। इस बार चमड़े से बने उत्पादों पर 28 फीसदी जीएसटी लग गई है। ऐसे में सौ रुपये कीमत वाला सामान 128 रुपये का मिल रहा था। दूसरे व्यापारी सोरों से आए रवि नेहरू ने बताया कि वह लोग मेले में दुकान लगाने के एवज में कम से कम दस हजार रुपये जिला पंचायत को अदा करते हैं। दस फुट की दुकान ही साढ़े छह हजार में लग पाती है। इसकी कीमत भी माल में जोड़नी पड़ती है। इस वजह से पशुपालक सामान खरीदने से बच रहे हैं।
धनूपुरा गांव से आए पशुपालक रामऔतार ने देहाती बोलचाल में अपना दर्द बताया। कहा कि साहब जा बार तो महंगाई जरूरत से ज्यादा है। हम अपने बैलन को सजान के लए सामान खरीदन आए तो दुकानदार जीएसटी लगाय रहे हैं। कई दुकानें देख डारीं पर सब जगह रेट बढ़े भये हैं। ऐसे में जरूरत भर को सामान ही खरीदो है। कादरचौक के हरिओम ने इसके लिए सरकार को कोसा। कहा कि सरकार को कम से कम किसान की जरूरत वाली चीजों का ध्यान तो रखना ही चाहिए था। किसान पहले से ही परेशान हैं। पिछली बार नोटबंदी ने तबाह कर दिया था। फसलें चौपट हुईं तो मजदूरी तक नहीं मिली। किसान करें तो क्या करें।
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कंबल पर 18, बेडशीट पर 22 फीसदी जीएसटी
ऐसा नहीं कि केवल पशु बाजार ही जीएसटी से प्रभावित हुआ है। कंबल पर इस बार 18 फीसदी जीएसटी लगी है तो बेडशीट 22 फीसदी जीएसटी लगाकर बेची जा रही हैं। इससे कपड़ा बाजार पर भी मंदी की मार है। लोग महंगा सामान खरीदने से परहेज कर रहे हैं। लाठी और ढोलक जीएसटी के दायरे से बाहर है।