कुंवरगांव। अहंकार पतन का कारण है, रावण हो या कंस सभी को अहम के चलते पतित होना पड़ा। यही नहीं अपनी शक्ति के मद में चूर इंद्र देव को भी नीचा देखना पड़ा। अहंकार से मन के सात्विक विचार नष्ट हो जाते है। तामसिक विचार से ग्रसित मनुष्य अपने को ही नष्ट करने का आमंत्रण देता है। नगर के ग्राम देवता मंदिर पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन आचार्य राघवानन्द गिरी ने अहंकार और क्रोध से होने वाली क्षति के बारे में विस्तार से वर्णन किया। आचार्य ने कृष्ण जन्मोत्सव एवं उनके बाल हट की कौतूहल लीला का रसपान कराया। भगवान कृष्ण के जन्म की आकर्षक झांकियां प्रदर्शित कर प्रसंग की व्याख्या की गई। उन्होंने माया मोह के बंधन से छुटकारा पाने का सरल उपाय ईश्वर की भक्ति को बताया। आरती के बाद प्रसाद वितरण किया गया। इस दौरान कथा आयोजक दीपक सैदू सिंह, नरेश, वीरेश आदि का मौजूद रहे।