बदायूं। शारीरिक अक्षमता के बावजूद सलीके से जीने की ललक हो तो इंसान क्या नहीं कर सकता। मथुरिया चौक पर दिव्यांग बच्चों के कौशल विकास और पुनर्वास के लिए संचालित आवासीय एक्सीलेंट लर्निंग कैंप में मौजूद बच्चों के क्रियाकलाप और इरादे देखकर समझा जा सकता है कि भविष्य में यह किसी के सहारे पर जिंदगी गुजारने वाले नहीं। दृष्टिबाधित और श्रवणबाधित अक्षमता के बावजूद हर बच्चे में कोई न कोई हुनर मौजूद है। शिक्षक भी उनकी प्रतिभा को लगातार धार दे रहे हैं।
दस माह के इस कैंप का समापन 31 मई को होना है। इसमें 93 बच्चे पंजीकृत हैं जिनमें से फिलहाल 68 यहां रह रहे हैं। इन्हें पढ़ाने और देखभाल के लिए सोलह लोगों का स्टाफ है। इनमें दो वार्डन, आठ विशेष शिक्षक, छह केयरटेकर मौजूद हैं। ठेकेदार की ओर से बच्चों को मैन्यू के तहत नाश्ता और खाना दिया जाता है। शुक्रवार को जब अमर उजाला टीम इस कैंप में पहुंची तो तमाम बच्चे मस्ती के मूड में थे। उनका दोपहर अवकाश का समय था। कुछ नहा रहे थे तो कुछ अपने वार्षिक कार्यक्रम की तैयारी का रिहर्सल कर रहे थे।
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शानदार गाते हैं मनोज और सुरजीत
मीरासराय निवासी मुनेंद्र और धकपुरा गांव का सुरजीत ताल से ताल मिलाकर ऐसा गाते हैं कि लोग झूमते रह जाएं। दोनों ही बच्चे पूरी तरह दृष्टिहीन हैं। दोनों गरीब परिवारों से हैं। मनोज के पिता तीन साल से बिस्तर पर हैं। मां मजदूरी करके उसके पांच भाई-बहनों का पेट पालती है। मनोज ने बताया कि जब वह दो साल का था, तब उसकी आंखों में मोतियाबंद हुआ और उसके बाद आंखों की रोशनी पूरी तरह चली गई। सुरजीत के पिता का निधन हो चुका है। पांच बीघा जमीन के सहारे उसकी मां चार बेटों को पाल रही हैं। बच्चों ने मेरा झंडा तिरंगा लहराए हवा में, वो भारत मां की शान है, उसकी छाया में समाया हिंदुस्तान है...गीत सुनाया जिसे वह वार्षिक समारोह में पेश करने वाले हैं।
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रतन को जुबानी याद हैं पहाड़े
गंगापुर गांव निवासी रतन भी अपनी आंखों की रोशनी खो चुका है। उसके पिता नहीं हैं। गरीब परिवार की मुखिया उसकी मां हैं। रतन फर्राटे से पहाड़े सुनाता है। विशेष शिक्षक विमल दुबे ब्रेल लिपि में दूसरे बच्चों के साथ ही उसे पढ़ाते हैं।
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शैक्षिक प्रदर्शनी का प्रमाणपत्र दिया
बदायूं। ककोड़ा मेला में शैक्षिक प्रदर्शनी लगाने के लिए जिला पंचायत अध्यक्ष ने समेकित शिक्षा विभाग को प्रमाणपत्र दिया। जिपं अध्यक्ष मधु चंद्रा ने कहा कि विशेष बच्चों की सराहना की। समेकित शिक्षा के विशेष शिक्षक सुरेश कुमार मिश्र ने कहा कि दिव्यांग बच्चों के लिए सफल पुनर्वास मुख्य रूप से उसके परिवार के सदस्यों की भागीदारी पर निर्भर करता है।