गंगा ने छीना आशियाना, प्रशासन देना भूला निवाला
दो दिन दिया पका खाना, अब रोटी-रोटी को मोहताज बाढ़ पीड़ित
अमर उजाला ब्यूरो
बदायूं/ उसहैत। जिले में बाढ़ पीड़ितों का बुरा हाल है। बाढ़ की चपेट में आकर उसहैत इलाके के जटा गांव के कई घर बह गए। पूरे गांव में बाढ़ का पानी भर गया। गंगा का विकराल रूप देख प्रशासन ने जटा गांव खाली कराकर लोगों को कटरा सहादतगंज स्थित प्राइमरी स्कूल में ठहरा दिया। इन बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि प्रशासन ने दो दिन तक खाना दिया। मगर उसके बाद में कोई देखने नहीं आया। इससे लोगों को एक वक्त रोटी मिलना मुश्किल है।
बाढ़ की चपेट में आया जटा गांव लगभग पूरी तरह गंगा में समा गया। वहीं अहमदनगर बझौरा में गंगा के कटान से करीब एक दर्जन घर बह गए। प्रशासन ने जटा गांव के करीब 150 परिवारों को कटरा सहादतगंज के प्राथमिक विद्यालय में बनाए राहत शिविर में एक सितंबर से ठहराया है। शुरू के दो दिन तक प्रशासन की ओर से बाढ़ पीड़ितों को खाना दिया। मगर बाद में उनके हाल पर छोड़ दिया।
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राशन मिल गया, लेकिन पकाने को ईंधन नहीं
डीएम और जनप्रतिनिधियों की ओर से बाढ़ पीड़ितों के लिए तीन सितंबर को राहत सामग्री का वितरण किया। इसमें दस किलो आटा, दस किलो चावल, दस किलो आलू, दो किलो तेल, आधा-आधा किलो हल्दी, नमक, मिर्च आदि मसालों के साथ ही पांच-पांच किलो परमल और चना शामिल रहे। मगर लोगों के पास उसे खाना पकाने के लिए सूखी लकड़ी, गैस आदि नहीं है। इससे राशन हाने के बाद भी लोगों को भूखे रहना पड़ रहा है।
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क्या बोले बाढ़ पीड़ित
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खाने को हुए मोहताज
शुरू में दो दिन तो खाने के लिए दिया गया था, लेकिन उसके बाद खाना एकदम बंद कर दिया। इसमें सबसे ज्यादा मुसीबत छोटे बच्चों की है।
-कलाम हुसैन, बाढ़ पीड़ित
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केवल दिखावा किया जा रहा
प्रशासन ने शुरुआत में लोगों को सुविधाएं दीं। इसके बाद में राशन तो दिया गया, लेकिन खाना पकाने को सूखी लकड़ी या गैस का कोई इंतजाम नहीं कराया।
-हब्बन, पूर्व प्रधान, बाढ़ पीड़ित
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सिर्फ परमल चने से भर रहे पेट
बाढ़ का पानी गांव में भर गया। प्रशासन ने बाढ़ से बचाने को स्कूल में ठहरा दिया, लेकिन लोगों को खाने पीने की दिक्कत है। मजबूरन सिर्फ परमल और चने से पेट भर रहे हैं।
-ताजुद्दीन, बाढ़ पीड़ित
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अनाथों की तरह छोड़ दिया
पहले खाना और फिर राहत सामग्री देकर अधिकारी चलते बने है। हमारे पास अपना कुछ नहीं है। अब क्या करें, यहां से कहा जाएं। पशुओं को कहां ले जाए, कुछ समझ नहीं आ रहा।
- अजित खां, बाढ़ पीड़ित