कलागढ़ में वनों की सीमा पर भ्रमण करते हाथी।
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बायो फेंसिंग से वनों में रोके जाएंगे वन्यजीव
कालागढ़ (बिजनौर)। विदेशी तर्ज पर बायो फेंसिंग के जरिए कार्बेट टाइगर रिजर्व/नेशनल पार्क वन्यजीवों को खेतों में आने से रोकने की कवायद में जुटा है। कालागढ़ क्षेत्र में किसानों को राहत के साथ ही मानव वन्यजीव संघर्ष से भी छुटकारा मिलने की आशा वन विभाग ने जताई है।
सीमावर्ती जनपद बिजनौर के किसानों के सामने वन्यजीवों के खेतों में आकर फसलों को नुकसान पहुंचाने की चिंता बनी रहती है। कार्बेट टाइगर रिजर्व/नेशनल पार्क के वन्यजीव जंगलों से निकलकर फसलों को नुकसान पहुंचाते रहते हैं। सबसे अधिक नुकसान हाथी खेतों में करता है। वन विभाग के सामने वन्यजीवों की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है। अक्सर मानव वन्यजीव संघर्ष की स्थिति आ जाती है। अब इसे वन विभाग बायो फेंसिंग के जरिए रोकने की तैयारी कर रहा है। जिसके तहत खेतों की सीमा पर जैविक कार्य किए जाऐंगे। विदेशों में वनों की सीमा पर बसे किसानों को इसका फायदा मिल रहा है। इसे अब यहां भी प्रारंभ किया जाएगा।
क्या है बायो फेंसिंग
कार्बेट टाइगर रिजर्व/नेशनल पार्क के निदेशक धीरज पांडेय ने बताया कि किसानों को खेतों के किनारे कुछ ऐसे उत्पाद करने होंगे जिनसे वन्यजीव खेतों में आने से रुक सकें। सबसे पहले मधुमक्खी पालन कराया जाएगा। अभी तक मधुमक्खी पालन में डिब्बे जमीन में ही रखे जाते थे, अब उन्हें पेड़ों पर लगाया जाएगा। सभी डिब्बों को किसी तार से जोड़ा जाएगा। जैसे ही उस तार को कोई छुएगा तो सभी छत्तों की मक्खी बाहर आ जाएगी। हाथी जैसा जीव फौरन ही वापस हो जाएगा। वन्यजीव मधुमक्खियों से दूरी बनाए रखते हैं। इस प्रकार की फेंसिंग अनेक देशों में वन विभाग कर रहा है। कार्बेट टाइगर रिजर्व के वनों में 2014-15 में हाथी गणना के अनुसार 1035 हाथी दर्ज किए गए थे। 2020 की गणना में इनकी संख्या 1200 से अधिक हो गई थी। अब इनकी संख्या 1300 से अधिक बताई जा रही है।
25 किलोमीटर तक के दायरे में होगी फेंसिंग
निदेशक ने बताया कि सबसे पहले ढेला से कालागढ़ व मोरघाटी तक यह फेंसिंग कराई जाएगी। किसानों को इसके बारे में प्रशिक्षण दिलाने से उसके उत्पाद को विक्रय करने तक को सिखाया जाएगा। इससे रोजगार के अवसर भी बढ़ सकेंगे। इसके लिए वन विभाग अपनी ईको विकास समितियों की मदद लेगा। ग्रामीणों से संवाद किया जाएगा। उन्हें जागरूक किया जाएगा। कार्बेट टाइगर रिजर्व में पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी परियोजनाएं चलती रहती हैं। यहां के पर्यावरण को संरक्षित रखने में ग्रामीणों का सहयोग मिलेगा।