बिजनौर में कछुओं के पुनर्वास के लिए हस्तिनापुर रेंज में गंगा किनारे हैचरी बनाई गई है। किसानों के खेतों में निकलने वाले कछुओं के अंडों को डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अधिकारी खुद जाकर कलेक्ट कर रहे हैं। हैचरी में इन अंडों को मानव निर्मित घोंसलों में रखा जा रहा है। अंडों से निकलने के बाद इन कछुओं के बच्चों को शुरुआत में एक तालाब में रखा जाएगा। तालाब में थोड़ा परिपक्व होने के बाद इन बच्चों को गंगा में छोड़ा जाएगा।
जलीय जीव ही नदी का जीवन हैं। गंगा नदी की धारा में कछुओं की 12 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से छह प्रजातियां खतरे में हैं। कछुए गंगा नदी के तट पर रेत में घोंसला बनाकर अंडे देते हैं। गंगा नदी के बहाव का क्षेत्र हर साल बदल जाता है। जहां गंगा का पानी नहीं होता, वहां किसान खेती करने लगते हैं। इस जमीन की जुताई करने, खेतों में फसल को पानी देने व पेस्टीसाइट के प्रयोग से अंडे नष्ट होते हैं। किसान भी अंडों को फेंक देते हैं। इससे हर साल हजारों अंडे बर्बाद हो जाते हैं और कछुओं संख्या अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ती है।
कछुओं के अंडों को सहेजकर उनकी संख्या बढ़ाने के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (वर्ल्ड वाइल्ड फंड) ने अभियान चलाया है। इस अभियान के अंतर्गत गंगा किनारे हैचरी (प्रजनन केंद्र) बनाए गए हैं। जहां भी किसान के खेत में अंडे निकलते हैं, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अधिकारी व कर्मचारी खेत में जाकर इन्हें ले लेते हैं। इन अंडों को हैचरी में मानव निर्मित घोंसलों में रखा जा रहा है। जब बच्चे अंडों से बाहर निकलेंगे तो उनको एक तालाब में रखा जाएगा। बाढ़ का समय निकलने के बाद इन बच्चों को गंगा की धारा में छोड़ दिया जाएगा।
तापमान, नमी का रखते हैं ध्यान
कछुए नवंबर से अप्रैल तक अंडे देते हैं। घोंसला बनाकर अंडा देते समय वे तापमान, नमी का ध्यान रखते हैं। कछुए घोंसले में अंडे की लेयर बनाते हैं। सबसे ऊपर की लेयर से बच्चे सबसे पहले निकलते हैं।
पौराणिक कथाएं हैं प्रचलित
कछुए को भगवान विष्णु का दूसरा अवतार माना जाता है। इस अवतार का नाम कच्छप था। कछुए से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं भी हैं। कछुए को नदी का गिद्ध भी कहा जाता हैॅ। यह मांसाहारी, शाकाहारी और सर्वाहारी होते हैं।
अंडे से निकल नदी की ओर भागते हैं बच्चे
कछुआ अंडे देने के बाद घोंसले में फिर नहीं आता है। फिर भी उसके बच्चे अंडे से निकलकर सीधे नदी की ओर ही भागते हैं। वाइल्ड लाइफ के अधिकारी अब भी इस पर शोध कर रहे हैं कि ऐसा कैसे होता है।
कर रहे पूरे प्रयास : संजीव यादव
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजना अधिकारी संजीव यादव के मुताबिक, कछुओं की संख्या बढ़ाने के लिए गंगा किनारे हैचरी बनाई जा रही है। उचित देखभाल से कछुओं की संख्या बढ़ेगी। कछुओं की संख्या बढ़ाने के लिए पूरे प्रयास किए जा रहे हैं।