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Bijnor News: दक्षिण भारत के राज्यों को भाया जनपद का खादी सूत

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गांधी जयंती पर विशेष
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- जिले से निर्यात हो रहे चादर, सूती कपड़े का थान, लिहाफ, गमछा, तौलिए आदि
-गुजरात, राजस्थान, बंगला, बिहार आदि राज्यों में जाता है खादी के वस्त्र

ब्रजवीर चौधरी
बिजनौर। बदलते दौर में खादी के धागे का स्वरूप बदल गया। एक तकली के चरखे के स्थान पर अब अंबर चरखे का इस्तेमाल हो रहा है। पहले चरखे पर मोटे सूत की एक तकली बनती थी। अंबर चरखे पर एक साथ आठ तकली बनती है। जिले में तैयार हो रहा सूती कपड़ा दक्षिण भारत के राज्यों में पकड़ बनाए हुए हैं।
तीन से चार दशक की बात करें तो घरों में महिलाएं चरखा चलाकर सूत की तकली बनाती थी। बदले युग में खादी की चाल पर असर आया है। मगर, आज भी एक वर्ग के लिए खादी पहली पसंद है। वर्तमान में जिले में सात यूनिट चल रही है। जिनसे सालभर में करीब 500 क्विंटल खादी सूत तैयार होकर वस्त्र आदि बनते हैं। जैतरा धामपुर के गोदाम से सप्लाई होती और बिक्री का मुख्यालय पर शॉप है।
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कई दशक पहले अधिकांश घर में चलता चरखा
कई दशक पहले की बात करें, तो अधिकांश घरों में चरखा रहता था। दादी, मां यानी घर की बुजुर्ग महिलाएं चरखा से सूत काटती थी। यानी चरखे से मोटा सूत की एक तकली बनाई जाती थी। उसके बाद उस तकली से दरी, कम्बल आदि बनाया करती थी। बुजुर्ग महिला सुनीता देवी व दयावती का कहना है कि उनकी सास और उन्होंने खूब चरखा चलाकर मोटा सूत तकली बनाई है।
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बाजार में बारीक सूत की मांग बढ़ी तो बारीकी सूत से चादर, थान, लिहाफ, तौलियां, गमछा, लूंगी आदि बस्त बना रहे हैं। लोकल बाजार के साथ दक्षिण राज्यों के बाजार में भेजा जाता है। जिले के सूती खादी, ऊनी खादी, पोली खादी बारी राज्यों में अच्छी मांग है।
- सुरेश सिंह कुशवाह, व्यवस्थापक श्रीगांधी आश्रम खादी भंडार बिजनौर
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