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बिजनौर: प्राचीन सभ्यताओं से जुड़ा रहा है जिले के शिवालयों का इतिहास

Wed, 15 Feb 2023 11:41 PM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बिजनौर
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नजीबाबाद के किला मोरध्वज क्षेत्र में मिला अर्धनारीश्वर शिवलिंग।
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- महाभारत काल के बताए जाते हैं मयूरेश्वर और मोरध्वजेश्वर महादेव मंदिर
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- तीतरवाला मंदिर के शिवलिंग और किला मोरध्वज क्षेत्र में मिले शिवलिंग की एक जैसी है बनावट
फोटो समाचार
अचल चौधरी
बिजनौर। शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में बसे बिजनौर के शिवालयों का इतिहास प्राचीन सभ्यताओं से जुड़ता रहा है। जिले में ऐसे भी शिवालय हैं, जिनमें स्थापित शिवलिंग को चार से पांच साल हजार पुराना बताया जाता है। खासकर किला मोरध्वज इलाके में मिले एक शिवलिंग की बनावट तीतरवाला के मंदिर में स्थापित स्वयंभू शिवलिंग की तरह है। चांदपुर के झारखंडी मंदिर में स्थापित शिवलिंग को भी महाभारत कालीन बताया जाता है। संवाद

शिवालय तीतरवाला
मंडावर क्षेत्र के गांव तीतरवाला के मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यह चार हजार साल पुराना है। किसी दौर में जब यह शिवलिंग जमीन के बाहर दिखाई दिया था तो काजीवाला के लोगों ने अपने गांव में ले जाने का प्रयास किया, लेकिन यह जमीन में धंस गया था। हालांकि काजीवाला के लोग शिवलिंग को अपने गांव तो नहीं ले जा सके। सबसे पहले जलाभिषेक करने का अधिकार उन्हीं को है। इस शिवलिंग की बनावट किला मोरध्वज में मिले अर्द्घनारीश्वर शिवलिंग की तरह ही है।
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इन शिवलिंग की प्रकृति खाती है मेल
मोरध्वज किला क्षेत्र में मयूरेश्वर और मोरध्वजेश्वर मंदिर में जो शिवलिंग स्थापित हैं, उन्हें महाभारत कालीन बताया जाता है। यहीं के रहने वाले देवराज सहगल बताते हैं कि इन शिवलिंग को पुरातत्व विभाग की पांच हजार साल पुराना बता चुका है। हरिद्वार के कुंडीसोता मंदिर के शिवलिंग और किला मोरध्वज क्षेत्र में मिले शिवलिंग के पत्थर भी एक जैसे हैं। नजीबाबाद के मोटामहादेव मंदिर और मृत्युंजय मंदिर के शिवलिंग की प्रकृति हरिद्वार के नीलेश्वर मंदिर से मेेेल खाती है।

खारी के झारखंडी मंदिर की भी खूब है ख्याति
जिले में खारी स्थित झारखंडी शिव मंदिर में स्वयंभू महादेव स्थापित हैं। यह मंदिर प्राचीन समय से आस्था का केंद्र बना हुआ है। करीब दो शताब्दी पहले सफाई के दौरान भूमि में एक शिवलिंग नुमा पत्थर दिखाई दिया था, मजदूरों ने काफी गहराई तक खोदाई की, लेकिन पत्थर का अंत दिखाई नहीं दिया। इस दौरान मजदूर का फावड़ा पत्थर पर लग गया। फावड़े के लगते ही पत्थर से दूध की धार निकलने लगी। यह बात क्षेत्र में जंगल की आग की तरह फैल गई।
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काफी पुराना है बरखंडी मंदिर का इतिहास
दारानगर गंज में बरखंडी मंदिर का इतिहास करीब चार सौ साल पुराना बताया जाता है। लोग कहते हैं कि चार सौ साल पहले यहां महादेव स्वयंभू प्रकट हुए थे। जिसके बाद मंदिर बनाया गया। कहते हैं कि किसी दौर में एक शेर यहां आया करता था, जिसके एक पैर में सोने का कड़ा भी होता था, लेकिन वक्त के साथ यह बात पुरानी हो गई। बता दें कि गंज का इतिहास पहले से ही महाभारत से जुड़ा रहा है।
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