- आजादी के आंदोलन में जिले के 700 से अधिक सेनानियों ने निभाई अहम भूमिका
- 13 अक्तूबर 1929 को धामपुर में हुई गांधी जी की सभा के बाद आंदोलन में कूदे
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संवाद न्यूज एजेंसी
नींदडू। आजादी के आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले जनपद बिजनौर के जिन 700 से अधिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने जेल की यातनाएं सहन कीं, उनमें मनकुआं के डाॅ. लाखन सिंह भी किसी से पीछे नहीं रहे। महात्मा गांधी के धामपुर आगमन से आठ वर्ष पहले ही गांवों में स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारी सुलग उठी थी। आजादी के सिपाही डाॅ. लाखन सिंह गांव के पहले व्यक्ति थे, जिन पर आंदोलन का नशा चढ़ा। गांधी जी के विचार सुनने के बाद उनका नशा और बढ़ गया।
मनकुआं में स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारी 1921 में उस समय सुलग उठी थी जब महावीर सिंह त्यागी (रतनगढ़) की अध्यक्षता में आजादी का सपना साकार करने में लगे कांग्रेसियों की गांव में विशाल सभा हुई। जनपद की इस सबसे बड़ी सभा में करीब 2000 लोगों ने भाग लिया था। तीन दिन तक चली सभा को सफल बनाने के लिए मनकुआं के हिंदू और मुसलमानों ने बराबर सहयोग दिया। सभा में जगदीशचंद्र सोती, नेमीशरण जैन, मोलाना मसीतुल्लाह, अब्दुल लतीफ, विश्वंभर नाथ माहेश्वरी आदि जिले के कई अग्रणी नेताओं ने भाग लिया। सभा का मकसद नगरों तक सीमित आजादी की हलचल को गांव-गांव तक पहुंचाने के अलावा ग्रामीणों को अंग्रेजों के अत्याचारों से अवगत कराना और उन्हें ब्रिटिश शासन के खिलाफ एकजुट करना था।
आठ वर्ष बाद चरखा संघ के प्रबंधक डॉ. जसवंत सिंह के आग्रह पर 13 अक्तूबर 1929 को विजयदशमी के दिन करीब 11 बजे पूर्वांह्न राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, बहन मीराबाई, पुरुषोत्तम दास टंडन, आचार्य जेबी कृपलानी व निजी सचिव प्यारेलाल के साथ रेलगाड़ी से धामपुर पहुंचे। गांधी जी ने केएम इंटर काॅलेज में आयोजित विशाल सभा को संबोधित किया। सभा में पांच हजार महिलाओं समेत 20 हजार लोग इकट्ठा हुए थे। मनकुआं से डाॅ. लाखन सिंह अपनी माता हरदेई, किशोर मनोहर सिंह अपनी माता फूलवती देवी एवं प्रवीण सिंह अपनी माता युद्धिया देवी के साथ गांधी जी के विचार सुनने के लिए धामपुर पहुंचे थे। कई अन्य व्यक्तियों ने गांधी जी के विचारों से प्रभावित एवं प्रेरित होकर देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का प्रण लिया।
डाॅ. लाखन सिंह को 1932, 1942 और 1943 में गंभीर आरोपों के साथ जेल भेजा गया। उनके पौत्र सेवानिवृत शिक्षक कीर्ति कुमार ने बताया कि उन्हें दो वर्ष के लिए आगरा जेल में नजरबंद किया गया। इससे पहले पुलिस के हाथ नहीं आने और घर व गांव से फरार रहने के चलते ब्रिटिश अदालत ने एक बार रुपये 50 और दूसरी बार रुपये 100 का आर्थिक दंड लगाया। परिवार द्वारा जुर्माना अदा नहीं करने के कारण दो बार घर की कुर्की की गई। महिलाओं के आभूषण, घर में मौजूद रसोई के बर्तन, चारपाई, तख्त, किवाड़, चौखटें, छत की कड़ियां, रथ, बेलगाड़ी एवं पशु आदि कुर्क कर अपने साथ ले गए। आजादी के 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को सम्मान स्वरूप अशोक चिह्न से सुसज्जित ताम्रपत्र प्रदान किए गए।