फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

नेताओं को भी फर्क नहीं पड़ता

Sat, 02 Jul 2016 11:35 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला
विज्ञापन
जिला अस्पताल - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
बिजनौर में एसी गाड़ी में घूमने वाले जिले के सांसद व विधायक भले ही अपने उपचार के लिए जिला अस्पताल न जाते हों, लेकिन सरकारी अस्पतालों से उनका गहरा रिश्ता है। कोई हादसा होने पर ये दौड़कर अस्पताल जाते हैं और इनके सामने ही घायल और मरीज हायर सेंटर रेफर हो जाते हैं। मरीजों के रेफर होते ही ये जनप्रतिनिधि भी अस्पताल से निकल जाते हैं। उनके सामने ही एक्सरे, खून की जांच, प्लास्तर आदि छोटी-छोटी असुविधाओं के कारण में मरीज रेफर कर दिए जाते हैं, लेकिन जनप्रतिनिधियों पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। चुनाव के समय ये जनता को चिकित्सा सुविधा दिलाने के खूब वादे करते हैं, लेकिन इन पर शायद ही अमल होता है। अस्पताल बंद होने पर मरीजों को निजी चिकित्सकों के पास ही मोटे रुपये खर्च करके उपचार कराने को मजबूर हैं।
विज्ञापन


सुविधा ही क्या है सरकारी अस्पताल में
रोटरी क्लब के पूर्व अध्यक्ष कमाल सफदर के अनुसार उन्होंने या किसी अन्य परिजन ने सरकारी अस्पताल में कभी उपचार नहीं कराया है। सरकारी अस्पतालों में सुविधा ही क्या है। छोटी मोटी चोट लगने पर ही रेफर कर देते हैं। दवाइयों के चार-पांच तरह के पैकेट हैं, उनसे ही सभी मरीजों को दवा दी जा रही है।

विभाग नहीं करता कार्रवाई : सांसद
भाजपा सांसद भारतेंद्र सिंह के अनुसार सरकारी अस्पतालों में बहुत बुरा हाल है। उन्होंने अस्पतालों का निरीक्षण भी किया है। आलम ये है कि अस्पतालों में रिकॉर्ड तक चेक नहीं होते। मशीनें पड़ी हैं, पर इस्तेमाल करने वाला कोई नहीं। भ्रष्टाचार चरम पर है।  कई बार सीएमओ को इस बारे में लिखा गया है, पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। फतेहपुर कला में बने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर उन्होंने दो माह पहले खुद जाकर निरीक्षण किया था। उसकी हालत बद से बदतर मिली थी। वहां आपरेशन थिएटर खुला बना है, गंदगी के ढेर जमा है। कुछ ऐसे केंद्र भी उन्होंने देखे हैं, जहां पर चिकित्सक न होने पर पशु बंधे हैं। भागूवाला, मंडावली, नांगल में कोई चिकित्सक नहीं है।
विज्ञापन


प्राइवेट चिकित्सक देते हैं अधिक समय
भाजपा सांसद भारतेंद्र सिंह के अनुसार सरकारी अस्पतालों में बहुत बुरा हाल है। उन्होंने अस्पतालों का निरीक्षण भी किया है। आलम ये है कि अस्पतालों में रिकॉर्ड तक चेक नहीं होते। मशीनें पड़ी हैं, पर इस्तेमाल करने वाला कोई नहीं। भ्रष्टाचार चरम पर है।  कई बार सीएमओ को इस बारे में लिखा गया है, पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। फतेहपुर कला में बने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर उन्होंने दो माह पहले खुद जाकर निरीक्षण किया था। उसकी हालत बद से बदतर मिली थी। वहां आपरेशन थिएटर खुला बना है, गंदगी के ढेर जमा है। कुछ ऐसे केंद्र भी उन्होंने देखे हैं, जहां पर चिकित्सक न होने पर पशु बंधे हैं। भागूवाला, मंडावली, नांगल में कोई चिकित्सक नहीं है।
आईएमए के अध्यक्ष डा. दिपेंद्र सिंह के अनुसार सरकारी चिकित्सक सुबह आठ से दो बजे तक बैठते हैं। जबकि निजी चिकित्सक सभी मरीजों को देखकर उठते हैं, चाहे रात के दस बज जाएं। भीड़ होने के कारण सरकारी चिकित्सक मरीजों को पूरा समय नहीं दे पाते, जबकि प्राइवेट चिकित्सक अपना पूरा समय मरीज को देता है। शायद इसी वजह से मरीजों की भीड़ निजी चिकित्सकों के पास अधिक जाती है।
विज्ञापन


 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें