बिजनौर में कसौंदी की फली बच्चों के लिए फिर मौत बनकर उग आई है। इस साल अभी तक इसे खाने वाले पांच मासूम बच्चों की जान चली गई है। खेतों की बाड़ और सड़क किनारे उग आने वाले कसौंदी के पौधों पर इन दिनों यह फली बहुतायत में है, जिसे खेल खेल या नामसझी में बच्चे खा लेते हैं और इनकी मौत हो जाती है। पहले इन बच्चों की मौतों का कारण रहस्यमयी बुखार माना जाता था, लेकिन शोध में इस बात का पता चला था कि कसौंदी खाने से बच्चों की मौतें होती हैं। चिकित्सक भी इससे बीमार होने वाले बच्चों का उपचार नहीं ढूंढ़ पाए हैं। कसौंदी के दानों का स्वाद मटर के दानों की तरह होता है। पिछले 15 सालों में यह फली 130 बच्चों को अपना निवाला बना चुकी है।
ज्यादातर बच्चे जंगल में भूख लगने पर इस फली का सेवन करते हैं, जिन्हें इसके जानलेवा प्रभाव की जानकारी नहीं होती है। इसके प्रभाव से ग्रसित होने वाले बच्चों के परिजन भी नहीं समझ पाते कि उन्हें क्या बीमारी हुई? बिजनौर से दिल्ली तक चिकित्सक भी ऐसे पीड़ित बच्चों की जान नहीं बचा पाते हैं। केवल उन्हीं बच्चों की जान बच पाई, जिन्होंने मामूली मात्रा में इस फली का सेवन किया था।
कसौंदी सेवन के जानलेवा परिणामों के बारे में अधिकांश लोग भी अनभिज्ञ हैं। शोध के बाद जब इस बारे में ग्रामीण लोगों को पता चला तो वे भी भौंचक्के रह गए थे। लोगों को विश्वास नहीं होता कि यह फली बच्चों के लिए जानलेवा होती है, लेकिन रिसर्च आधारित जानकारी के बाद लोग विश्वास करने लगे हैं। जहां जागरूकता आई, वहां लोगों ने कसौंदी के पेड़ भी उखाड़ने शुरू किए। लेकिन इस खरपतवार का स्थाई समाधान नहीं है और न ही सरकारी स्तर पर इस ओर किसी का ध्यान साल दर साल जाता है।
गरीब परिवारों के बच्चे होते हैं शिकार
कसौंदी की फली गरीब परिवारों के मासूम बच्चों को ज्यादा निवाला बना रही है। जो परिवार सब्जी उगाते हैं उनके बच्चे इस फली को खा कर जान दे रहे हैं। चिकित्सक बताते हैं कि खेतों में काम करने वाले परिवारों के बच्चे इस फली को अधिक खा रहे हैं और उनकी जान जा रही है।
लेकिन लीवर के लिए है फायदेमंद
वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विपिन मोहन वशिष्ट बताते हैं कि कसौंदी की फली ज्यादा मात्रा में खाने से ही बच्चों की जान जाती है। लीवर की प्रत्येक दवा में कसौंदी का प्रयोग होता है। कम फली खाने से यह फायदेमंद होती है। बडे व्यक्ति की एक बाल्टी फली खाने से जान जा सकती है। 10 किलो का बच्चा अगर 0.5 प्रतिशत फली खा ले तो उसकी जान चली जाएगी। फली में एन्थोक्लॉन होता है, जो जानलेवा होता है। ज्यादा फली खाने से बच्चों का लीवर काला पड़कर खत्म हो जाता है। इस फली को मिटटी खाने वाले व भूखे बच्चे ज्यादा पसंद करते हैं।
कसौंदी को लेकर चलेगा अभियान : सीएमओ
सीएमओ डा. राकेश मित्तल के मुताबिक कसौंदी की फली के खिलाफ अभियान चलवाया जाएगा। इसके लिए प्रचार प्रसार होगा। जहां कसौंदी के पौधे हैं उन्हें उखड़वाया जाएगा। गांव के लोगों को इस फली से बच्चों को दूर रखने के लिए जागरूक किया जाएगा। जिले में सभी चिकित्सकों को इस बारे में कड़े निर्देश दिए गए हैं। लोग भी जहां कसौंदी का पेड़ दिखाई दे उसे उखाड़ फेंके।
इस साल इन बच्चों की हुई मौत
-20 अक्टूबर को साहनपुर निवासी मोहम्मद जफर की पांच साल की पुत्री शबनम की मौत हुई
-24 अक्टूबर को नजीबाबाद के मोहल्ला पहाड़गंज के इरफान की तीन वर्षीय पुत्री आफिया मरी
-सात नवंबर को नजीबाबाद के गांव इस्सेपुर निवासी कोमल की पांच वर्षीय पुत्री सलोनी की मौत
-10 नवंबर को गांव बल्दिया निवासी सुखराम के पांच वर्षीय पुत्र कार्तिक की फली खाने से मृत्यु
फली खाने के बाद बच्चों में लक्षण
-सांस फूलना व दौरे पड़ना
-बुखार और उल्टी आना
-उल्टी सीधी हरकत करना
-हाथ, कंधा या बाल काटना
-हाथ और पैर फेंकने लगना
-मुंह से झाग व खून की उल्टी
वर्ष बीमार मौत
2003 15 9
2004 22 16
2005 18 12
2006 23 17
2007 35 23
2008 21 16
2009 16 11
2010 10 8
2011 1 1
2012 4 3
2013 5 3
2014 3 3
2015 3 2
2016 1 1
2017 2 2
2018 6 5