नगीना में खुद बनाई गई कांच की शीशी के साथ अब्दुल सलाम।
- फोटो : BIJNOR
अब्दुल सलाम के खजाने में गंगाजल लाते हैं कांवड़िये
नगीना। नगर के अब्दुल सलाम के हाथों से बनाई जाने वाली कांच की शीशी हरिद्वार से गंगाजल लेकर आने वाले कांवड़ियों की पहली पसंद हैं। महाशिवरात्रि के पर्व पर हरिद्वार से कांवड़िये जिस कांच की शीशी में पवित्र गंगाजल लेकर आते हैं, वह नगीना के एक बुजुर्ग मुस्लिम के घर की भट्टी पर बनाई जा रही हैं।
करीब एक दशक पहले तक नगीना की पहचान काष्ठ कला के कार्यों के अलावा कांच की शीशी से हुआ करती थी। नगर के मोहल्ला मनिहारी सराय में रहने वाले मनिहार बिरादरी के सैकड़ों परिवार पहले कोयले की भट्टियों पर कांच की शीशियां बनाने का काम करते थे। इस मोहल्ले की बुजुर्ग बताते हैं कि सदियों से इस मोहल्ले में कांच की शीशी बनाई जाती रही हैं। एक समय यहां 28 से अधिक भट्ठियां थीं। सरकार रियायती मूल्य पर कोयला मुहैया कराती थी। महाशिवरात्रि के पर्व पर महीनों पहले से छोटे बड़े आकार की शीशियां बननी शुरू हो जाती थीं। जिनकी सप्लाई हरिद्वार में होती थी और कांवड़ लाने वाले शिवभक्त इन्हीं कांच की शीशियों में गंगाजल भरकर लाते थे।
कांच की शीशियां बनाने के पुराने उस्ताद 75 वर्षीय बुजुर्ग अब्दुल सलाम के घर में स्थित एकमात्र भट्ठी पर ही कांच की शीशियां बनाने का काम हो रहा है। अब्दुल सलाम बताते हैं यह उनका 200 साल पुराना काम है, जिसको वह खुद पिछले 55 सालों से कर रहे हैं। वह बताते हैं की शीशी बनाने की कला उन्होंने अपने पिता अब्दुल शकूर व दादा से सीखी थी। अब उनके खुद के दोनों बेटों ने इस काम से मुंह मोड़ लिया है। वह बताते हैं कि बढ़ती उम्र व बीमारी के चलते अब उनके मोहल्ले के अन्य लोग उनकी भट्ठी पर आकर अपनी शीशी बनाने का काम करने लगे हैं। कांवड़ के जल के लिए चार अलग-अलग आकार की कांच की शीशी बनाई जाती हैं। इस बार शिवरात्रि के मौके पर काफी डिमांड रही, लेकिन जितनी शीशी तैयार हो पाईं हरिद्वार पहुंचा दी र्गइं।