सेवार्थ और कमाई मॉडल में फंसा सौ बेड का अस्पताल
बिजनौर। बिजनौर में जिस गति से कोरोना के केस बढ़ रहे हैं, उस लिहाज से स्वास्थ्य विभाग के पास संसाधन नहीं है। कहीं अस्पताल हैं तो उसमें तैनात करने के लिए योग्य चिकित्सक नहीं। ऐसे में पिछले माह धामपुर में एक सौ बेड का अस्पताल चलाने पर प्रशासन और आईएमए के बीच सहमति बनी। निरीक्षण भी हो गया और उम्मीद जताई जा रही थी कि जल्द इसमें कोरोना के मरीज अपना इलाज करा सकेंगे। इसके बावजूद अंतिम समय में मामला सेवार्थ और कमाई मॉडल के बीच फंस गया। जहां चिकित्सकों ने मरीजों से सरकारी दर पर फीस वसूलने की शर्त रख दी, वहीं प्रशासन ने इस कॉमर्शियल मॉडल को मंजूरी देने से इंकार कर दिया।
पिछले माह डीएम के साथ आईएमए की बैठक हुई थी, जिसमें सौ बेड का अस्पताल निजी चिकित्सकों द्वारा चलाने का प्रस्ताव रखा गया था। धामपुर में तैयार सरकारी इमारत में इसे चलाने पर सहमति भी बन गई। आईएमए के प्रतिनिधि मंडल ने मेरठ मेडिकल कॉलेज की तर्ज पर इसमें ऑक्सीजन, वेंटिलेटर आदि की सुविधा देने का दावा भी किया। लेकिन बाद में हालात यह हो गए कि सेवार्थ और कॉमर्शियल मॉडल के बीच यह अस्पताल शुरू ही नहीं हो पाया।
नगीना-धामपुर मार्ग पर शुरू होना था अस्पताल
धामपुर में नगीना रोड पर बनने वाला यह कोविड अस्पताल धामपुर से नगीना मार्ग पर लगभग दो किलोमीटर दूर गांव चकशहजानी के पास स्थित है। सौ बेड का यह अस्पताल स्वास्थ्य विभाग की ओर से करीब 37 करोड़ रुपये की लागत से तैयार कराया गया है। अस्पताल भवन पूरी तरह से ऑक्सीजन पाइप लाइनयुक्त है।
आपदा है, पर कॉमर्शियल मॉडल मंजूर नहीं: डीएम
डीएम बिजनौर रमाकांत पांडेय ने बताया कि यह बात सही है कि आपदा के समय हमारे पास संसाधन कम है और हमें इसे बढ़ाने की जरूरत है। आईएमए प्रतिनिधिमंडल की ओर से धामपुर में सौ बेड का अस्पताल का जो प्रस्ताव आया था वह कॉमर्शियल था। उसमें वह लांग टर्म कांट्रेक्ट चाह रहे थे, जिसे अनुमति देना हमारे स्तर से संभव नहीं है। सेवार्थ अस्पताल चलाना है तो कभी भी शुरू कर सकते हैं। कॉमर्शियल पैटर्न पर अस्पताल चलाने के प्रस्ताव को हम शासन को भेजेंगे, वहीं से इस पर निर्णय होगा।
फीस से केवल खर्च पूरा करना है उद्देश्य: डॉ. प्रकाश
अस्पताल चलाने का प्रस्ताव देने वाले डॉ प्रकाश कहते हैं कि प्रशासन को जो प्रस्ताव दिया था, उसमें सरकारी दर पर ही मरीजों से फीस लेने की बात कही गई थी। अस्पताल शुरू करेंगे तो 50 से 60 लाख रुपये रनिंग खर्च आता। वहां वेंटिलेटर से लेकर तमाम उपकरण, पैरामेडिकल स्टॉफ भी रखना पड़ता। केवल दो साल के लिए कांट्रेक्ट की बात कही थी। इसका मकसद केवल इतना था, ताकि आने वाले समय में कोरोना बढ़ता है तो यह अस्पताल मरीजों के काम आ सके।