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बिजनौर के अक्षरों से समृद्ध हुई हिंदी भाषा

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भोलानाथ त्यागी - फोटो : BIJNOR
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बिजनौर के अक्षरों से समृद्ध हुई हिंदी भाषा
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कोतवाली देहात/बिजनौर। उच्च शिक्षा में हिंदी बिजनौर के अक्षरों से समृद्ध हुई थी। वजह, स्वामी श्रद्धानंद ने उस समय बिजनौर जनपद में शामिल गुरुकुल कांगड़ी में सबसे पहले उच्च शिक्षा में हिंदी की पुस्तकों से पढ़ाई शुरू कराई थी। स्वामी श्रद्धानंद ने अध्यापकों और कुशाग्र छात्रों से अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई जाने वाली यूरोप विश्वविद्यालय की पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद कराया था। इसलिए हिंदी भाषा को समृद्ध करने में बिजनौर जनपद की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
जनपद बिजनौर के अनेकों साहित्यकारों, पत्रकारों तथा लेखकों ने अपनी लेखनी के माध्यम से हिंदी भाषा की सेवा की। जनपद की भूमि पर जन्म लेने वाले कई लेखक राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी भाषा के संवाहक बने और हिंदी को समृद्ध किया। अंग्रेजी शासनकाल में उच्च शिक्षा के लिए अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ाई कराई जाती थी। जनपद के इतिहास के जानकार ग्राम फीना निवासी हेमंत कुमार बताते हैं कि सन् 1902 के आसपास स्वामी श्रद्धानंद ने कांगड़ी गांव में गुरुकुल का निर्माण कराया था। उस समय कांगड़ी गांव बिजनौर में शामिल था और इसकी जमीन भी बिजनौर जनपद के मुंशी अमन सिंह ने दान दी थी। स्वामी श्रद्धानंद ने गुरुकुल कांगड़ी में उच्च शिक्षा की व्यवस्था की। हिंदी में पाश्चात्य वैज्ञानिक ग्रंथों की रचना ही गुरुकुल द्वारा प्रारंभ हुई। इस प्रकार उच्च शिक्षा में गुरुकुल कांगड़ी से शुरू हुआ हिंदी पाठ्यक्रम का सिलसिला पूरे देश में फैल गया।
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1915 में गुरुकुल कांगड़ी का दौरा किया। तब वह हिंदी में उच्च शिक्षा दिए जाने को देखकर बेहद प्रसन्न हुए। महात्मा गांधी ने मदन मोहन मालवीय से कहा था कि वह भी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा में पाठ्यक्रम शुरू कराएं।
पहले हिंदी ग्रंथ की श्रेणी में शामिल हुए
प्रोफेसर महेशचरण सिंह की हिंदी रसायन, प्रो. साठे का विकासवाद, श्रीयुत गोवर्धन की भौतिकी और रसायन, प्रो. रामशरणदास सक्सेना का गुणात्मक विश्लेषण, प्रो. सिन्हा का वनस्पति शास्त्र, प्रो. प्राणनाथ का अर्थशास्त्र, राष्ट्रीय आय-व्यय शास्त्र और राजनीतिशास्त्र, प्रो. बालकृष्ण का अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र, और प्रो. सुधाकर का मनोविज्ञान हिंदी में अपने-अपने विषय के पहले हिंदी ग्रंथ की श्रेणी में शामिल हुए।
दुष्यंत कुमार ने भी हिंदी गजल को राष्ट्रीय स्तर पर दी पहचान
हिंदी गजलकार दुष्यंत कुमार का जन्म एक सितंबर सन 1933 को बिजनौर जिले के ग्राम राजपुर नवादा में हुआ था। दुष्यंत कुमार से पहले हिंदी में गजल नहीं लिखी जाती थी। दुष्यंत कुमार ने आम बोलचाल की भाषा को अपनी कविताओं का माध्यम बनाया और उन्होंने उर्दू से इतर हिंदी में गजल लिखी।
डॉ. महावीर अधिकारी ने हिंदी में किया लेखन
जिले के ग्राम पैगंबरपुर में एक जनवरी 1918 को जन्में डॉ. महावीर अधिकारी ने हिंदी की विभिन्न विधाओं में लेखन किया। उन्होंने निबंध, उपन्यास, कहानी, जीवनी के साथ-साथ कई पुस्तकों का अनुवाद भी किया।
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हिंदी साहित्य को किया समृद्ध करने का कार्य
जनपद के ग्राम नायक नगला में जन्मेें पंडित पदम सिंह शर्मा ने हिंदी साहित्य को समृद्ध करने का कार्य किया। साहित्यकार भोला नाथ त्यागी ने बताया कि पंडित पदम सिंह शर्मा के लेखन का लोहा मुंशी प्रेमचंद तक ने माना। उन्होंने बिहारी सतसई तुलनात्मक अध्ययन, बिहारी सतसई संजीवन भाष्य आदि पुस्तकों की रचना की। पदम सिंह शर्मा को बिहारी सतसई पर सन् 1922 में मंगला पारितोषिक सम्मान प्राप्त हुआ। नहटौर में जन्में रविंद्र नाथ त्यागी देश के प्रसिद्ध व्यंगकार रहे। डॉ. उषा त्यागी के अनुसार हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के बाद उन्हें व्यंग विधा का महारथी माना जाता है।

दुष्यंत कुमार की फाइल फोटो- फोटो : BIJNOR

महावीर अधिकारी।- फोटो : BIJNOR

रूद्रदत्त शर्मा की फाइल फोटो- फोटो : BIJNOR

स्वामी श्रद्धानंद की फाइल फोटो- फोटो : BIJNOR

रविंद्र नाथ त्यागी की फाइल फोटो- फोटो : BIJNOR

पंडित पदम सिंह शर्मा की फाइल फोटो- फोटो : BIJNOR

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