नजीबाबाद में बज्म-ए-जिगर शेरी नशिस्त में भाग लेते शायर।
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...फ्रेम बदले जाएंगे, तस्वीर बदली जाएगी
नजीबाबाद। बज्म-ए-जिगर की ओर से शेरी नशिस्त में शायरों ने कलाम पेश किए।
बज्म-ए-जिगर की ओर से मोहल्ला रम्पुरा में शायर मौसूफ वासिफ के आवास पर अकरम जलालाबादी की नात से शेरी नशिस्त की शुरूआत हुई। जानेमाने शायर महेंद्र अश्क का कलाम रफ्तेगाने वक्त की तकदीर बदल जाएगी, फ्रेम बदले जाएंगे तस्वीर बदली जाएगी काफी सराहा गया। शायर उबैद अहमद की गजल मैं कैसे मान लूं मुझे मंजिल न मिलेगी.., मौसूफ वासिफ का कलाम खुदा परस्तों को महमां बनाके मारोगे.., सय्यद अहमद का कलाम गर्म जोशी से मिला करता था मैं हर किसी से.., शकील वफा की गजल बिगड़ी अगर सवार दे वो उसका शुक्रिया.., शादाब जफर शादाब की गजल कल तक जो भीख मांगे थे जहरदार हो गए.., तय्यब जमाल की गजल जाने क्यूं उल्टी बात कहता है पसंद की गई। महेंद्र अश्क की अध्यक्षता और शादाब जफर शादाब के संचालन में हुई शेर नशिस्त के अंत में शायर शहबाज इब्ने मख्वी की मौत पर शायरों ने खिराज-ए-अकीदत पेश की।