जिले में कुपोषण से हुई चार बच्चों की मौत
बिजनौर। जिले में पिछले दो वर्षों में ही केवल चार बच्चों की मौत कुपोषण से हुई है। फिलहाल जनपद की स्थिति में काफी सुधार है। पहले लोगों में जागरूकता का अभाव था, लेकिन अब बदलाव देखने को मिल रहा है। चिकित्सकों की मानें तो कुपोषण की तीन श्रेणी होती हैं। केवल तीसरी श्रेणी में ही बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराया जाता है। इससे पूर्व की दो अवस्थाओं में बच्चे की परवरिश घर पर ही ठीक से की जा सकती है। वर्तमान में जिला अस्पताल स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र में 13 बच्चे भर्ती है, जिनका उपचार बाल रोग विशेषज्ञ एवं कुशल डाइटिशियन की देखरेख में चल रहा है।
जिला अस्पताल में पोषण पुनर्वास केंद्र बना है। इसमें एक साथ दस बच्चों के भर्ती होने की व्यवस्था है। यहां पर प्रतिदिन बच्चों की शारीरिक क्षमता के अनुसार बच्चों को उन्हें पोषण दिया जाता है। पोषण पुनर्वास के नोडल अधिकारी एवं जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केके सिंह के अनुसार पांच साल पहले जिला अस्पताल में पोषण पुनर्वास केंद्र की स्थापना की गई थी। प्रदेश के हर जिले में दस बेड के केंद्र खोले गए हैं। बच्चों की संख्या अधिक होने पर बेड की संख्या बढ़ा ली जाती है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में जिला पोषण पुनर्वास केंद्र में 13 बच्चे भर्ती हैं। उन्होंने बताया कि अति कुपोषित बच्चों को 14 दिन तक और गंभीर परिस्थिति में तीन सप्ताह तक भी बच्चे को भर्ती करना पड़ सकता है। यहां पर बच्चे को उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता के अनुसार कुपोषण टेबल के अनुरूप ही पोषित आहार दिया जाता है। बच्चों के साथ साथ उनकी देखभाल करने वाले अभिभावक को भी खाना दिया जाता है। इसके अलावा 50 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती रहने तक बच्चे के माता-पिता को दिया जाता है।
श्रेणी-3 के बच्चे को ही एनआरसी में कराएं भर्ती
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केके सिंह बताते हैं कि कुपोषण की तीन अवस्थाएं होती हैं। पहली और दूसरी पोजीशन में बच्चे का पालन-पोषण बाल रोग विशेषज्ञ और डाइटिशियन की सलाह के अनुसार घर पर भी किया जा सकता है। बताया कि रतनगढ़ के बच्चे कुपोषित तो थे, लेकिन अति कुपोषित नहीं थे। तीन बच्चे करीब एक सप्ताह से बच्चा वार्ड में भर्ती थे। तबियत में सुधार होने पर उन्हें छुट्टी दे दी गई।
आरबीएसके टीम रखे ध्यान
सीएमओ डॉ. राकेश कुमार यादव ने बताया कि राष्ट्रीय बाल सुपोषण कार्यक्रम के अंतर्गत जिले के हर ब्लॉक में दो-दो टीम कार्य कर रही हैं। इसमें एएनएम, आंगनबाड़ी, आशा आदि शामिल होते हैं। इनका काम यही होता है कि अपने क्षेत्र में जाकर काउंसलिंग करें और जो बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, उनके माता-पिता से मिलकर उन्हें पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती होने के लिए प्रेरित करें। उन्होंने बताया कि जो भी अपने बच्चों को एनआरसी में भर्ती कराने के लिए राजी न हों, उनकी अलग से लिस्ट तैयार करें।