बिजनौर में नूरपुर विधानसभा उपचुनाव में दलित व जाटों को बांधने में भाजपा नाकामयाब रही। चुनाव में भाजपा के अपने भी बेगाने बने रहे। चेहरा दिखाने के लिए तो तमाम नेता रहे पर किसी ने चुनाव में जमीनी स्तर पर काम नहीं किया। यही वजह रही कि भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा।
उपचुनाव में महागठबंधन के निशाने पर जाट व दलित वोट थे। हालांकि भाजपा व सपा दोनों दलों ने बिरादरी में अपने नेताओं की फौज उतार रखी थी। पर जाटों को अपने पाले में लाने के लिए सपा ने पहले से ही तैयारी कर ली थी। सपा ने पूर्व मंत्री स्वामी ओमवेश को चुनाव मैदान में उतार दिया। गठबंधन के तहत रालोद नेता भी चुनाव में उतर गए थे। रालोद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी की नूरपुर क्षेत्र में सभा कराई गई। इलाके के जाट विधायक स्व.लोकेंद्र चौहान से एक-दो छोटी बात को लेकर नाराज चल रहे थे।
इस नाराजगी को भाजपा का कोई नेता दूर नहीं कर पाया। रालोद के नेताओं ने जाट बाहुल्य क्षेत्रों में डेरा डाल रखा था तो पूर्व मंत्री स्वामी ओमवेश सुबह आंख खुलते ही जाटों के घरों पर पहुंच जाते थे और उन्हें सपा को वोट देने की शपथ दिलाते थे। भाजपा नेता सोचते थे कि जाट वोट उनका है। वह उनसे दूर नहीं जाएगा। भाजपा को जाटों को रिझाने के लिए पंचायतीराज मंत्री भूपेंद्र चौधरी, बिजनौर के सांसद भारतेंद्र सिंह समेत कई जाट नेताओं को क्षेत्र में उतार रखा था, पर ये नेता बिखरे जाटों को पाले में लाने में कामयाब नहीं हुए। नूरपुर विधानसभा क्षेत्र में 35 हजार दलित हैं। दलित निर्णायक स्थिति में थे। दलितों को पाले में लाने के लिए भाजपा व गठबंधन के नेताओं में शह मात का खेल चल रहा था। गठबंधन के नेता दलितों की खूब खातिरदारी करने में लगे थे।