बिजनौर। जिला कृषि, सांस्कृतिक व औद्योगिक प्रदर्शनी में शनिवार रात आयोजित कवि सम्मेलन में प्रख्यात कवियों ने श्रोताओं को अपनी रचनाएं सुनाकर खूब तालियां बटोरीं। तड़के पौने पांच बजे तक श्रोताओं ने कवियों की रचनाओं का भरपूर आनंद लिया।
शुभारंभ डीएम विनोद पंवार, एडीएम प्रशासन राममूर्ति मिश्र, एसडीएम सहदेव मिश्र, चेयरमैन फरीद अहमद ने संयुक्त रूप से किया। कवि सुमनेय सुमन ने सरस्वती वंदना सुनाई। कवि ईश्वरचंद गंभीर की रचना ‘जलता हुआ गांधी का वतन देख रहा हूं पुस्तक की जगह हाथ में गन देख रहा हूं, कैसे विवेकानंद बने कोई बच्चा यहां पीढ़ी में चरित्रों का निधन देख रहा हूं’।
उन्होंने आतंकवाद को निशाना बनाते हुए कहा - जब चाहा जिसके घर में घुसे गोली मार दी, देते हुए पड़ोसी को सहारे नहीं देखे, छुपजाते हैं वो दिन ढले आतंक के डर से, बच्चों ने कई साल से तारे नहीं देखे।
हास्य कवि वेद प्रकाश वेद ने मिलावट में खिलावट सुनाकर सभी को खूब गुदगुदाया। उन्होंने सुनाया कि मेरी खुदकुशी के चर्चे थे शहर में, सुबह उठा तो पता चला कि मिलावट थी जहर में। पद्मभूषण प्रख्यात कवि डा.गोपालदास नीरज ने कहा कि उजालों ने जब भी अंधेरों से दोस्ती की है, जलाकर अपना ही घर मैंने रोशनी की है, सबूत है मेरे घर में धुएं के ये धब्बे, कभी यहां पर उजालों ने खुदकुशी की है।
उन्होंने एकता का नारा देते हुए कहा अब कोई मजहब ऐसा भी चलाया जाए, जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए। हास्य कवि डा.सुनील जोगी ने मंच पर आते ही हंसी की बरसात शुरू करा दी। उन्होंने सुनाया कि देखो कुर्सी की बलिहारी ओ जमाना बदला जाए, कर दी खटिया खड़ी हमारी ओ जमाना बदला जाए, ऊपर वाला भक्त भेजता है अपने चुन चुन के, सारे संतों पर भारी हैं राधे मां के ठुमके, संन्यासन हैं या बीमारी ओ जमाना बदला जाए।
उनका देशप्रेम का ये मुक्तक खूब पसंद किया गया कहीं गीता महकती है कहीं कुरान जिंदा है, भले हों चीथड़े तन पर मगन ईमान जिंदा है, अमीरों की नजरों में तो लंदन और पेरिस है, किसानों और मजदूरों में हिंदुस्तान जिंदा है। कन्या भ्रू्ण हत्या का संदेश देते हुए कहा कि वो अपने कैमरे से जिंदगी के सीन लेता है वो अपने चाहने वालों के दुखड़े छीन लेता है, कभी भूले से बेटी को गर्भ में तुम मार मत देना, वो बेटी मारने वालों से बेटा छीन लेता है।
डा. कुंवर बेचैन ने, मुझे ये क्या हुआ मैं किस कहानी तक चला आया, मैं पहले प्यार की पहली निशानी तक चला आया। सुनाकर खूब तालियां बटोरी। उन्होंने मातृ शक्ति को नमन करते हुए कहा, तेरी हर बात चलकर यूं मेरे जी से आती है, कि जैसे याद की खुशबू हिचकी से आती है, तेरे चरणों से आती है वो खुशबू जो पूजा की थाली में पिघलने के घी से आती है।
कवि डा. हरिओम पंवार ने झन्नाटेदार आवाज में ‘मैं एक ताकत के लिए समर्पण वंदन गीत नहीं गाता, दरबारों के लिए कभी अभिनंदन गीत नहीं गाता’ कविता सुनाकर सभी की खूब तालियां बटोरीं। उनकी शहीदों को समर्पित कविता जिन बेटों ने पर्वत काटे हैं अपने नाखूनों से उनकी कोई मांग नहीं है दिल्ली के कानूनों को’ खूब पसंद किया गया।
युवा कवि सुदीप भोला ने आरक्षण पर चोट करते हुए कहा, आरक्षण का मतलब सुनलो बिल्कुल ताजा-ताजा, कुंडी मत खटकाओ राजा, सीधे अंदर आजा। उन्होंने बाल श्रम के खिलाफ गीत गाकर सभी को झकझोरा। उन्होंने अपने गीत से सभी की देशभक्ति भावनाओं को भी झकझोरा।
उन्होंने सुनाया ‘जिन्होंने हंसकर दे दी जान, बढ़ाई भारत मां की शान, तिरंगे का रखा सम्मान मैं तुझसे पूछूं हिंदुस्तान उन्हें हम क्या दे पाए, क्रिकेट के मैदान पर बेशक पुरस्कार बरसा दो, फिल्मी हीरोइन के डांस पर भी दौलत खूब लूटा दो, लेकिन उसको क्या उत्तर देना है ये बतला दो, हेमराज की मां कहती है बेटे का सिर ला दो, शेरनी लगा रही हुंकार, अभी उसने ना मानी हार, देश पर पुत्र किया बलिहार, पोते को कर रही तैयार, देश की आन बान की खातिर जो बन गई पन्ना धाय ,उन्हें हम क्या दे पाए।
कवि दिनेश रघुवंशी ने शहीद के परिजनों पर मुक्तक सुनाते हुए कहा कि मिटा पर मातृ भूमि की पीड़ हर आया सलामी दो, कर वो अपने पूर्ण सारे फर्ज कर आया सलामी दो, वहां हर आंख नम थी जब पिता से बूढ़ी मां बोली, तिरंगे में लिपटकर लाल घर आया सलामी दो।
उन्होंने मां से बिछुड़े बेटे की भावना सुनाई, भरे घर में तेरी आहट कहीं मिलती नहीं अम्मा, तेरे हाथों की नर्माहट कहीं मिलती नहीं अम्मा, मैं तन पर लादे फिरता हूं दुशाले रेशमी लेकिन, तेरी गोदी सी गर्माहट कहीं मिलती नहीं अम्मा।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे डा.प्रवीण शुक्ल ने कहा कि किसी के प्यार का सपना सलोना टूट सकता है, मसीहा मुस्कुराहट का भी हमसे रूठ सकता है, हमेशा मुस्कुराकर बात करो मासूम बच्चों से, जरा सी ठेस लगने से खिलौना टूट सकता है।कार्यक्रम अध्यक्षता सभासद सरोज अग्रवाल, माया देवी और संयोजक अतुल गुप्ता और डॉ. दीपक विश्नोई रहे। आयोजक दीपक गर्ग मोनू ने सभी का आभार व्यक्त किया।
खड़े होकर किया अभिवादन
आयोजकों द्वारा महान कवि डा.गोपालदास नीरज को कविता पाठ करने के लिए नहीं बल्कि देखने के लिए बुलाया गया था। 92 साल के नीरज जी को कुर्सी पर बिठाकर स्टेज पर लाया गया। उनके आने व जाने पर सभी ने खड़े होकर तालियां बजाईं।