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चुनाय सेठ, जिनके घर शीशे के होते हैं ....

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अख्तर उल इमान (फाइल फोटो)। - फोटो : BIJNOR
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चिनॉय सेठ, जिनके घर शीशे के होते हैं ....
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बिजनौर। चिनॉय सेठ, जिनके घर शीशे के होते हैं वह दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते। फिल्म वक्त में बॉलीवुड के किंग कहे जाने वाले अभिनेता राजकुमार द्वारा बोला गया यह डायलॉग आज भी बेहद प्रसिद्ध है। इस डायलॉग को लिखने वाले अख्तर उल इमान जनपद बिजनौर के नजीबाबाद के निकट गांव घिसटपुरी में पैदा हुए थे। यह गांव पत्थर गढ़ के किले के निकट है और ग्राम पंचायत महावतपुर के अंतर्गत आता है। अख्तर उल इमान उन चंद लेखकों में रहे जिन्हें फिल्म फेयर अवार्ड और साहित्य अकादमी पुरस्कार दोनों से सम्मानित किया गया।
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अख्तर उल इमान को बचपन से ही शायरी का शौक था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा नजीबाबाद और बिजनौर में हुई। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वह सरकारी नौकरी करने लगे। नौकरी के साथ-साथ अख्तर उल इमान ऑल इंडिया रेडियो से जुड़ गए। 1945 में वह मुंबई चले गए निर्देशक बीआर चोपड़ा के साथ उन्होंने वक्त, हमराज और कानून जैसी फिल्में कीं। वक्त को बहुत बड़ी सफलता प्राप्त हुई। वक्त के डायलॉग आज भी याद किए जाते हैं। अख्तर उल इमान ने कानून फिल्म के संवाद लिखें। इस फिल्म की विशेषता यह थी कि इस फिल्म में कोई भी गाना नहीं था, जबकि उस समय बिना गाने की फिल्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। उनके लेखन में जहां उर्दू की बानगी दिखाई देती है। वहीं, उनके लेखन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खड़ी बोली का भी प्रभाव भी दिखता है। अख्तर उल इमान ने जमीर, दाग, धुंध, जोशीले, आदमी और इंसान, चिराग, इत्तेफाक, हमराज, पत्थर के सनम, गवन, मेरा साया, फूल और पत्थर, गुमराह जैसी लगभग चार दर्जन फिल्मों की पटकथा लिखी। उनकी कई किताबें भी प्रकाशित हुई। उनकी किताब यादें को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, जबकि संवाद लेखन के लिए फिल्म वक्त और धर्मपुत्र के लिए अख्तर उल इमान को दो फिल्म फेयर अवार्ड भी मिले। शोले फिल्म में गब्बर का अभिनय करने वाले अभिनेता अमजद खान से उनकी पुत्री का विवाह हुआ था। अख्तर उल इमान की मृत्यु 7 मार्च 1996 को मुंबई में हुई।
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