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Bijnor News: कर्ज में डूबा क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम केंद्रीय वस्त्रागार

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पांच करोड़ रुपये के घाटे में चल रहा है उपक्रम
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कर्मचारियों को छह महीने से नहीं मिली पगार



सतीश शर्मा
धामपुर। सरकार की उपेक्षा के कारण धामपुर का क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम केंद्रीय वस्त्रागार दम तोड़ने के कगार पर है। हालात यह है कि केंद्रीय कार्यालय पांच करोड़ के घाटे में चल रहा है। कार्यालय की आमदनी 20 प्रतिशत और खर्चा 80 प्रतिशत से अधिक हो रहा है। यहां के कर्मचारियों को छह महीने से पगार नहीं मिली है।
प्रबंधक विजयमल ने बताया कि गांव जैतरा में यह क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम का केंद्रीय मुख्यालय साल 1978 में स्थापित हुआ था। उस समय खूब कच्चा माल आता था। जमकर खादी वस्त्रों का उत्पादन होता है। 10 हजार से अधिक महिलाएं सूत कातने का काम करती थीं। 500 से ज्यादा बुनकर कपड़ा बुनते थे। यहां का तैयार माल देश के विभिन्न राज्यों में निर्यात होता था।
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कोरा विभाग के प्रभारी राजदेव का कहना है कि उस समय का वार्षिक टर्न ओवर करोड़ों रुपयों का होता था। अब सैकड़ा भी पार नहीं कर रहा है। सूत कातने वाली महिलाओं की संख्या 100 से कम रह गई है। घाटा होने के कारण अधिकांश बुनकरों ने भी परंपरागत धंधे से किनारा कर लिया और अन्य दूसरे कामों में लग गए।

पांच प्रतिशत उत्पादन भी नहीं हो रहा
सिलाई विभाग के प्रभारी मुन्ना सिंह का कहना है कि सरकार की उपेक्षा के कारण अब न तो खादी की मांग है और न ही उत्पादन हो रहा है। वर्तमान में पांच प्रतिशत उत्पादन भी नहीं हो रहा। जो माल तैयार होता है, महंगा होने से बाजार में बिक्री नहीं है। प्राइवेट संस्थानों की खादी पर कम जीएसटी है। उनके उपक्रम की खादी पर 18 प्रतिशत से ज्यादा जीएसटी है। ग्राहक वहां से खरीदारी करता है, जहां उसे सस्ते में अच्छा माल मिलता है। किसी जमाने में यहां पर 100 से ज्यादा कर्मचारी काम करते थे, जो घटकर केवल 15 रह गए हैं। उन्हें भी पिछले छह महीने से वेतन नहीं मिल पा रहा है। श्रमिक दीनदयाल का कहना है कि नुकसान के चलते 20 साल से संस्थान के भवन की मरम्मत और पुताई आदि भी नहीं हो सकी है।
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हालात बहुत खराब है

उपक्रम को उबारने के लिए छह करोड़ का बैंक लोन भी लिया, फिर भी हालात नहीं संभलें। प्रति महीने ब्याज के छह लाख रुपये भी देने भारी पड़ रहे हैं। यूपी और उत्तराखंड सरकार की ओर से कोई ग्रांट आदि नहीं मिलती। - मोहनलाल मिश्रा, सचिव, वस्त्रगार
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