बिजनौर। जल ही जीवन है। विश्व जल दिवस पर जीवन को बचाने के लिए जल संरक्षण को लेकर हर साल लोगों को जागरूक किया जाता है, लेकिन स्थिति भयावह है। औद्योगिक इकाइयां भूगर्भ जल में जहर घोल रही है। अंधाधुंध जलदोहन के कारण धरती का गर्भ सूख रहा है। 16 सालों में जिले के अंदर साढ़े तीन से साढ़े चार मीटर जलस्तर गिर गया है। जल संरक्षण में सहायक झील, तालाब और कुओं पर अवैध कब्जों की लंबी फेहरिस्त प्रशासन की कवायदों की पोल खोल रही है। जनपद में तीन हजार से अधिक तालाब, झील और कुओं पर अवैध कब्जे वाटर हार्वेस्टिंग की राह में रोड़ा बने हुए है। कहीं पर तालाबों पर अवैध भवन बने खड़े हैं तो कहीं पर झीलों व नदियों को जमीन की भूख निगलती जा रही है।
चकबंदी विभाग की कारगुजारी के कारण भी तालाबों और झालों से अवैध कब्जे नहीं हट रहे हैं। कई मौजो में चकबंदी समाप्त हो गई है, पर अवैध कब्जे अभी भी बरकरार हैं। चकबंदी प्रक्रिया एवं वन क्षेत्र में वृद्धि के कारण अभी भी 440 तालाबों और झीलों पर कब्जा है। सरकारी भवनों में भी वर्षा जल संचयन का प्रावधन नहीं है। विकास भवन, कलेक्ट्रेट, जिला अस्पताल, सरकारी कालोनियां, कांशीराम आवास कालोनी समेत वर्षा जल संचयन पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। इसके अतिरिक्त हर साल शहर के बाहर ढेर सारी प्राइवेट कालोनियां भी बिना वर्षा जल संचयन लगाए ही बन रही है। जिले में हर साल करीब सात हजार से भी ज्यादा बोरिंग बढ़ रहे है। वर्ष 2004 में जिले के अंदर 70 हजार बोरिंग थे, लेकिन अब बढ़कर एक लाख 37 हजार हो गए हैं। इसमें घरों में जलदोहन कर रहे बोरिंग भी शामिल है। पिछले आठ वर्षों में जिले के अंदर जल दोहन की गति दो गुनी हो गई है।