बिजनौर। जहरीले हो चुके जिले के बासमती चावल को फिर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने के लिए जैविक खेती का सहारा लिया जाएगा। बीते साल खाड़ी देशों ने जिले के चावल में हानिकारक तत्वों की अधिकता पाते हुए इसे खरीदने से मना कर दिया था। पेस्टीसाइड के अधिक प्रयोग से चावल में जहरीले तत्वों की मात्रा बढ़ गई थी। जैविक खेती से चावल तैयार कर बाजार में अधिक मूल्यों पर बेचा जा सकता है।
कुछ साल पहले तक जिले में पैदा होने वाले बासमती चावल की खाड़ी देशों में बहुत मांग थी। जिले के किसानों की बासमती की फसल को खाड़ी देशों से अच्छी कीमत मिलती थी। निर्यातक किसानों के खेत से ही बासमती चावल खरीद लेते थे। फिर कुछ साल तक राजनीतिक कारणों से खाड़ी देशों को चावल निर्यात नहीं किया गया। दो साल पहले ये रोक हट गई। जिले के किसानों ने फिर से पूरी मेहनत से बासमती चावल की खेती की। चावल के सैंपल आदि सामान जांच के लिए विदेश भेजे गए। जिसके बाद विदेशी कंपनियों ने इस चावल को खरीदने से मना कर दिया। इसकी वजह बताई गई चावल में अंधाधुंध पेस्टीसाइड के प्रयोग से चावल का जहरीला होना।
आईसोप्रोथियोलेन और बुप्रोफेजिन रसायन की मात्रा अधिक
देश सहित जिले के चावल में भी आईसोप्रोथियोलेन, बुप्रोफेजिन रसायन की मात्रा अधिक पाई गई। यह मात्रा .05 प्रतिशत तक पाई गई। इतनी मात्रा में ये रसायन शरीर को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। अपने देशवासियों की सेहत का ध्यान रखते हुए विदेशी कंपनियों ने जहरीला चावल नहीं खरीदा, लेकिन जिले में पेस्टीसाइड के प्रयोग वाली फसलें धड़ल्ले से बेची जा रही हैं। इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कृषि विभाग ने इस साल किसानों को जैविक खेती के लिए प्रेरित करते हुए गेहूं की जैविक खेती कराई थी। जैविक तरीके से पैदा हुए गेहूं का उत्पादन छह क्विंटल प्रति बीघा तक निकला। अब गेहूं की तर्ज पर धान विशेषकर बासमती की बुवाई भी जैविक विधि से कराने की तैयारी की जा रही है।
गोबर की खाद और बैक्टीरिया से होगी खेती
जैविक खेती में पहले मिट्टी और बाद में फसल की जरूरत को पूरा किया जाता है। जैविक खेती गोबर की खाद के अलावा बैक्टीरिया पर निर्भर होती है। मिट्टी में अगर हानिकारक जीव जैसे दीमक हैं तो उन्हें बैक्टीरिया के जरिये ही खत्म किया जाता है। अगर फसल में कोई बीमारी आती है तो उसे जैविक उर्वरकों से खत्म किया जाता है। जैविक खेती से जमीन की उर्वरक क्षमता कभी खत्म नहीं होती है और मिट्टी या फसल में कभी हानिकारक रसायन नहीं पनपते।
ऐसे काम करता है पेस्टीसाइड
पेस्टीसाइट एक तरह का जहर ही होता है। फसलों से कीट आदि नष्ट करने के लिए इसका स्प्रे खेत में किया जाता है। ये मित्र कीटों को भी मार देता है। पेस्टीसाइट में मौजूद रसायन फसल और मिट्टी के अंदर भी जाते हैं। जो जीव इसके प्रयोग से मरते हैं वे मिट्टी में गलते हैं और उनके अंदर का रसायन भी मिट्टी में ही घुल जाता है। सिंचाई के समय ये हानिकारक रसायन फसलों में पहुंच जाते हैं। हाल ही में यूरोपीय देशों ने फसलों में पेस्टीसाइड के प्रयोग पर पूर्णत: रोक लगा दी है। वहां के किसानों को जैविक खेती की ओर मोड़ा जा रहा है। पेस्टीसाइट के प्रयोग से मिट्टी व स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान के बारे में बताया जा रहा है।
जैविक खेती में लागत कम कमाई ज्यादा
जैविक खेती करने से उत्पादन लागत कम हो जाती है। जैविक उर्वरकों की कीमत बहुत कम होती है। सरकार इन पर सब्सिडी भी देती है। जैविक खेती से तैयार फसल की बाजार में भी अच्छी कीमत मिलती है। जिले के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. शिरिश कुमार के अनुसार पेस्टीसाइड दिल, किडनी, लीवर के बहुत नुकसान दायक है। लगातार इनके शरीर में जाने से शरीर के नर्वस सिस्टम को भी खतरा रहता है। कृषि उपनिदेशक जेपी चौधरी के अनुसार किसान को जैविक खेती की ओर फिर से लौटना होगा। पेस्टीसाइड इंसान और मिट्टी दोनों के लिए बहुत नुकसानदायक हैं। किसान जैविक खेती को अपनाएं और कम कीमत पर फसल का अच्छा उत्पादन लें।
नुकसान वाले कीटों को मारें जैविक उर्वरक से
बिजनौर। फसल बोने से पहले खेत तैयार किया जाता है। अगर फसल में हानिकारक कीट जैसे दीमक है तो जैविक कीटनाशक बेबियाना बेसियाना खेत में पानी भरकर उसमें डाला जाता है। खेत में धान की फसल की रोपाई करते समय जैव उर्वरक राइजोबेरियम और पीएसवी खेत में डाले जाते हैं। इसके बैक्टीरिया मिट्टी से फसल को पोटाश उपलब्ध कराते हैं। धान की फसल में बाली आने से पहले तक नाममात्र के रोग आते हैं। इसके बाद आने वाले रोग भी कीट जनित हैं। कीट पौधे की पत्ती खाते हैं या पौधे का रस चूसते हैं। इन्हें खत्म करने के लिए ट्राईकोडर्मा का छिड़काव होता है। इस दवाई से फंगस/कवक जनित रोग खत्म होते हैं। स्यूडोमोनोस, वैक्यूलोवाइरस, हैलीकोवर्पा आर्मीजेरा, स्पोडोपटेरा लिटूरा आदि दवाई भी बहुत कारगर है। कृषि उपनिदेशक जेपी चौधरी के अनुसार जैविक विधि से धान बोने वाले किसानों के खेतों की निगरानी विभाग के कर्मचारी खुद करेंगे।
ऐसे बढ़ती है उर्वरकता
दस किलोग्राम गाय के गोबर में 100 लीटर गौमूत्र, दो किलो गुड़ और किसी दाल का आटा, एक किलो मिट्टी को 200 लीटर पानी में मिलाकर पांच से सात दिन तक सड़ाएं। इस मिश्रण को दिन में तीन बार हिलाएं। इस तैयार घोल को बूंद बूंद करके पानी के साथ खेत में डालने पर खेत की उर्वरकता बढ़ेगी। यह मिश्रण पांच बीघा जमीन के लिए पर्याप्त है।