गंगा में डॉल्फिन की गणना के लिए जाती टीम।
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बिजनौर। गंगा में डाल्फिन का कुनबा इस बार बढ़ सकता है। 225 किलोमीटर की धारा में चलाए जा रहे सर्च अभियान के शुरूआत में 35 किलोमीटर क्षेत्र में ही टीम को 11 डॉल्फिन मिल गई हैं। जबकि पिछले साल पूरे 225 किलोमीटर के एरिया में कुल 30 डॉल्फिन ही मिली थीं।
केंद्र सरकार ने 2009 में डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया था। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (वर्ल्ड वाइल्ड फंड) और उत्तर प्रदेश वन विभाग की ओर हर साल गंगा में बालवाली घाट से नरौरा बैराज तक डॉल्फिन की संख्या जानने के लिए अभियान चलाया जाता है। 225 किलोमीटर लंबी गंगा की धारा में पिछले साल 30 डॉल्फिन दिखीं थीं। बिजनौर क्षेत्र में केवल 10 डॉल्फिन ही दिखी थीं। मेरी गंगा मेरी सूंस अभियान की शुरूआत मंगलवार को बैराज से की गई। इस बार बिजनौर के 35 किलोमीटर के एरिया में ही टीम को 11 डॉल्फिन दिख चुकी हैं। इनमें तीन-चार बच्चे भी शामिल हैं। वन विभाग के अनुसार बिजनौर में 100 किलोमीटर गंगा का क्षेत्र आता है। बिजनौर क्षेत्र डॉल्फिन को पसंद आ रहा है। उम्मीद जताई जा रही है कि इस बार गंगा में डॉल्फिन की संख्या और बढ़ेगी। इस उम्मीद से सर्च अभियान चलाने वाले अफसरों के चेहरे खिल गए है।
तरंगों से शिकार पकड़ती है डॉल्फिन
गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन को गेंगेटिक रीवर डॉल्फिन कहते हैं। यह समंदर में मिलने वाली डॉल्फिन से अलग होती हैं। गेंगेटिक रीवर डॉल्फिन अंधी होती हैं। ये गंगा में मछलियां खाती हैं और शरीर से निकलने वाली तरंगों से शिकार को पकड़ती हैं। मादा डॉल्फिन की लंबाई पौने दो मीटर तक होती है। नर डॉल्फिन मादा से छोटा होता है।
सामाजिक प्राणी है डॉल्फिन
गेंगेटिक रीवर डॉल्फिन सामाजिक प्राणी होती हैं। यह कभी कभी नाव या पानी में तैरने वाले मनुष्यों पास आकर उनके साथ तैरने लगती हैं। यह आक्रामक प्रवृत्ति की नहीं होती हैं और मनुष्य पर हमला नहीं करती हैं।
डॉल्फिन की संख्या बढ़ना अच्छा संकेत
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजना अधिकारी संजीव यादव के अनुसार बिजनौर क्षेत्र में डॉल्फिन की संख्या बढ़ना एक अच्छा संकेत हैं। यह बताता है कि उसे यहां का वातावरण पसंद का आ रहा है। यहां की जलवायु उसके अनुकूल है।