धान को ‘गर्दन तोड़’ बीमारी से खतरा
नगीना। धान की फसल पर बाली निकल चुकी है और ऐसे में तरह-तरह की बीमारी फसल को अपनी चपेट में ले लेती हैं। इस मौसम में गर्दन तोड़ बीमारी से फसल को अधिक खतरा है। वैज्ञानिकों ने किसानों को इस बीमारी से बचाव के उपाय बताए हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. केके सिंह ने धान की फसल को कीटों और बीमारियों से बचाव की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस समय तना छेदक कीट तने के अंदर घुस कर पत्ती को काट देता है। जिसके बाद बाली सफेद रंग की दिखती है। ब्लास्ट रोग धान के पौधो की गांठ, पत्तियों एवं बालियों के निचले भाग पर जहां से पौधा जुड़ा होता है, उसको प्रभावित करता है, जिससे धान की बालियां टूट कर गिर जाती हैं और बालियों में दाना नहीं पड़ता। इस रोग को गर्दन तोड़ रोग के नाम से जाना जाता है। यह रोग बासमती धान की प्रजाति को अधिक प्रभावित करता है। वहीं हापर कीट भूरा एवं सफेद रंग का होता है। यह व्यस्क तने से उसका रस चूस लेता है, जिसके कारण फसल सूख जाती है। गंधी रोग धान की बाली से दूधिया रस को चूस लेता है, इसके कारण बालियां खाली रह जाती हैं और दानों पर काले धब्बे बन जाते हैं।
इन बीमारियों से बचाव के लिए उन्होंने तना छेदक के लिए क्यूनालफास 25 ईसी दो मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से, ब्लास्ट रोग में एडिफेनफास की एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से प्रयोग करने और गंधीबग रोग में मैलाथियान की धूल को 25-30 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से सुबह के समय छिड़काव करने, हापर रोग के लिए बूप्रोफेजिन 25 प्रतिशत एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से प्रयोग करने की सलाह दी है।