बिजनौर। तमाम अटकलों के बीच केंद्र सरकार ने तीन तलाक पर रोक का कानून लोकसभा में पास करा लिया। पिछले एक साल से यह मामला बहुत सुर्खियों में रहा है। यूपी के विधानसभा चुनाव में तो भाजपा ने तीन तलाक खत्म करने को चुनावी मुद्दा ही बना दिया था। तीन तलाक पर रोक को लेकर मुस्लिम समुदाय की भी अलग-अलग राय है। कुछ इसका समर्थन करते हैं तो कुछ विरोध में हैं।
जमीयत उलेमा के जिला सदर कारी अरशद का कहना है कि संविधान ने देश के सभी नागरिकों को अपने धर्म के साथ रहने की आजादी दी है। तो तीन तलाक को इतना बड़ा मसला क्यों बनाया जा रहा है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, दारूल उलूम देवबंद व जमीयत उलेमा की हिदायतों का मुस्लिम समाज पालन करता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक पर दखल न देने के लिए केंद्र सरकार को पत्र भी लिखा है। मुस्लिम समाज अपने मजहब के हिसाब से जीवन व्यतीत करता है। सरकार दूसरे मसलों पर ध्यान दें।
डा.सिब्तैन सैयदा का कहना है कि वह तीन तलाक पर बिल का समर्थन करती हैं, लेकिन मजहबी ऐतबार से यह फैसला हर फिरके के नियम के अनुसार लागू होना चाहिए। जहां तक तीन तलाक का मामला है तो कानून लागू होने पर पति को जेल जाएगी। ऐसे में बच्चों का क्या होगा। इस सिलसिले में भी सरकार को सोचकर फैसला लेना चाहिए।
नगर पालिका नजीबाबाद की चेयरपर्सन साबिया निशात का कहना है कि तीन तलाक का मामला मुस्लिमों की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा से जुड़ा है। केंद्र सरकार ने एकदम से इस पर रोक लगा दी है। भारत में दुनिया में बहुत सम्मान रखने वाले इस्लामिक संगठन है। केंद्र सरकार या उनके प्रतिनिधियों ने किसी भी संगठन से इतना बड़ा फैसला लेते समय बात नहीं की है। केंद्र सरकार को सभी बिंदुओं को ध्यान में रखकर निर्णय लेना चाहिए।