बिजनौर। आलू की फसल इस साल किसानों के लिए मुसीबत ही साबित हुई है। आलू की फसल ने किसान का दीवाला निकाल दिया है। बाजार में पुराना आलू आढ़त पर केवल 300 रुपये प्रति क्विंटल तक ही बिक रहा है। आलू के इतने दाम भी नहीं मिल रहे हैं कि किसान उसे मंडी ले जा सकें।
जिले में हजारों बीघा जमीन में आलू की फसल बोई जाती है। पिछले साल नवंबर दिसंबर में आलू के दाम एक हजार रुपये प्रति क्विंटल तक थे। अधिक उत्पादन होने पर किसान आलू को कोल्ड स्टोरेज में रख देते हैं। वहां पर आलू रखने के लिए किसान से 240 रुपये प्रति क्विंटल तक किराया लिया जाता है। इस साल मार्च में आलू के दाम कम थे। आलू केवल 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल तक बिका। इसे देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सभी जिलों में क्रय केंद्र बनवाकर आलू खरीदवाने तक की व्यवस्था कराई थी, लेकिन तब भी किसानों ने फिर से फसल के दाम बढ़ने का अंदेशा जताते हुए कोल्ड स्टोरेज में रख दिया था। बीते साल आलू के दाम एक हजार रुपये क्विंटल तक मिले थे। इससे उम्मीद थी कि इस साल भी नवंबर दिसंबर में किसानों को फसल का अच्छा मूल्य मिलेगा, लेकिन हुआ इसका एकदम उल्टा है। पुराने आलू की फसल आढ़त पर 300 रुपये प्रति क्विंटल तक ही बिक रही है। किसान को फसल का इतना मूल्य भी नहीं मिल रहा है कि वह अपनी फसल कोल्ड स्टोरेज से निकालकर मंडी तक पहुंचाने का खर्च भी निकाल ले। कई किसानों ने तो फसल को कोल्ड स्टोरेज से उठाने से ही मना कर दिया है।
नौ हजार बोरी पड़ीं, नहीं उठा रहे किसान
रौनक कोल्ड स्टोरेज के संचालक मोहम्मद शहादत के अनुसार कोल्ड स्टोरेज में करीब साढ़े चार हजार क्विंटल आलू यानि करीब नौ हजार बोरी आलू पड़ा है। आलू रखने का किराया भी 240 रुपये से घटाकर 100 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है। संपर्क करने के बाद भी किसान आलू नहीं उठा रहे हैं।
भाकियू जिलाध्यक्ष दिगंबर सिंह के अनुसार चीनी मिलों को गन्ने से फायदा है तो सरकार उनका मूल्य अपने हाथों में रखती है। आलू व अन्य फसलों से उद्योगपतियों को फायदा नहीं इसलिए किसानों के नुकसान को कोई नहीं देखता है। किसानों को सभी फसलों के न्यूनतम मूल्य मिलने चाहिए, चाहे वह सरकार दे।