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बाघ के डर और सिकुड़ रहे जंगल से गांवों की ओर बढ़ रहे गुलदार

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सिकुड़ रहे जंगल से गांवों की ओर बढ़ रहे गुलदार
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बिजनौर। बाघ का डर और सिकुड़ रहे जंगल गुलदार को गांवों में जाने को मजबूर कर रहे हैं। गुलदार की दस्तक गांवों में बढ़ती जा रही है। खेतों से गुलदार के बच्चे मिल रहे हैं। खेतों में गुलदार दिखने से गांव वाले भी भयभीत हैं। गुलदार अपना खेतों में डेरा जमा रहे हैं और रात को गांवों में आकर पशुओं की दावत उड़ा रहे हैं। गुलदार के गांवों में आने से किसानों में भी हड़कंप मचा है।
कभी वनों में दिखने वाला गुलदार अब खेतों में घूमता दिख रहा है। खेतों से गुलदार के बच्चे दिख रहे हैं। गांवों में गुलदार की आवक जोर पकड़ती जा रही है। गुलदार बाघ से बहुत डरता है। बाघ के डर व मौसम के बदलते परिवेश में जंगलों से गुलदार गर्मी की तलाश में अपने आशियाने सीमावर्ती क्षेत्रों के गन्ने के खेतों को बना रहे हैं। अमानगढ़ टाइगर रिजर्व, कार्बेट टाइगर रिजर्व, साहूवाला आरक्षित वन क्षेत्र, नजीबाबाद वन प्रभाग से वनों से बड़ी संख्या में गुलदार जैसे जीव गन्ने के खेतों में अपना आसरा बना रहे हैं। अक्सर गन्ने की छोल के दौरान यह जीव खेतों में किसानों के सामने आ जाते हैं। इससे दोनों की ही सुरक्षा को खतरा पैदा हो जाते हैं। इसके अलावा वनों के मुकाबले खेतों में गुलदार को रहने के लिए बेहतर हालात मिल रहे हैं। सर्दियों में गन्ने के खेत में पत्ती से गुलदार को अच्छी खासी गर्मी भी मिलती है। अफजलगढ़ क्षेत्र के अलावा हीमपुर, झालू, हल्दौर क्षेत्र के गांवों में गुलदार आए दिन अपनी घुसपैठ कर रहे हैं। गांवों में गुलदार कुत्ते, सूकर, गाय, भैंस आदि को अपना निवाला बना रहे हैं। गन्ने के खेत गुलदारों का बसेरा बन गए हैं। गुलदार अपने शावकों को भी गन्ने के खेत में ही जन्म दे रहे हैं। बच्चों व खुद का पेट भरने के लिए गांवों के आसपास आसान शिकार मिल रहे हैं। गांवों में गुलदार दिखने से किसान भी अपनी व बच्चों की सुरक्षा के लिए चिंतित हैं। हालांकि जिले में अभी तक गुलदार द्वारा मानव बच्चे पर हमले का मामला सामने नहीं आया है। गुलदार मजबूरी में ही खेतों में किसान पर हमला करते हैं।
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बाघ के डर से छोड़ा वन
जिले में पहले गुलदार अमानगढ़ क्षेत्र में रहते थे। धीरे धीरे अमानगढ़ क्षेत्र व बाकी क्षेत्र में बाघ की आवक बढ़ती गई। गुलदार बाघ से डरता है। इस वजह से गुलदार ने धीरे धीरे अमानगढ़ रेंज से बाहर निकलना शुरू किया और खेतों का रुख किया। अब गन्ने के खेत गुलदार का ठिकाना है।

तो बच्चों को छोड़ देती हैं मां
गुलदार स्वभाव से बेहद शर्मीला जीव होता है। यह इंसानों से दूर ही रहता है। प्रणय के समय ये खेतों को अपना आशियाना बनाते हैं। नर व मादा गुलदार अलग अलग रहते हैं। अगर इंसान गुलदार के बच्चों को उठा ले तो बच्चों में इंसानी गंध आने के कारण मादा गुलदार बच्चों को छोड़ देती है।

गांवों के पास जीने का संघर्ष नहीं
जंगल में जीने के लिए संघर्ष करना होता है। लेकिन खेतों के किनारे आसानी से भोजन मिल जाता है। गुलदार जंगली जानवरों के अलावा रात के अंधेरे में किसानों के पशुओं व कुत्तों को अपना निवाला बनाते हैं। कुत्ते गुलदार की पसंदीदा खुराक होते हैं। आसान भोजन की तलाश उन्हें गांवों में खींच लाती है।

ऐसा होता है गुलदार
गुलदार हल्के पीले रंग का होता है। उस पर हल्के धब्बे होते हैं। गुलदार अधिकतम 58 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तरा से दौड़ता है। यह एक बार में छह मीटर तक की छलांग मार सकता है। इसका वजन 50 से 90 किलोग्राम तक होता है। मादा गुलदार और नर गुलदार अलग अलग रहते हैं।

गुलदार के बच्चे मिले
जिले में गांवों में गुलदार बहुत आ रहे हैं। इस महीने खेतों में गुलदार के पांच बच्चे मिल चुके हैं। इन्हें कानपुर स्थित चिड़ियाघर में छोड़ा गया है। इसके अलावा कुछ जगह पर गुलदार द्वारा किसानों के पीछे भागने की बात कही जा रही है।
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जंगल में ही हैं गुलदार: डीएफओ
डीएफओ डा.एम सेम्मारन के मुताबिक गुलदार बाघ के डर से जंगलों के आसपास अपना ठिकाना बनाते हैं। इनके द्वारा लगातार ठिकाना बदलने से गांवों में इन्हें देखने की शिकायत मिल रही हैं। जहां गुलदार गांव में घुसकर ज्यादा शिकार करता है, वहां पिंजरा लगाकर गुलदार को पकड़ा जाता है। जंगल गुलदार का घर है। वह अपने घर में ही रह रहा है।
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