अस्पताल में दवाओं का टोटा
बिजनौर। जिले से अंधता कैसे मिटाई जाए। अंधता निवारण के लिए चल रही सरकार की योजनाएं अपने जनपद में ही फ्लॉप हो गई हैं। पिछले आठ माह से जिला अस्पताल में साढ़े तीन साल से मोतियाबिंद का एक भी ऑपरेशन नहीं हो पाया है। चिकित्सक इसके लिए दवाइयां अस्पताल में नहीं होने को जिम्मेदार मानते हैं। ऑपरेशन कराने के लिए मरीजों को जिला अस्पताल से मेरठ के लिए रेफर कर दिया जाता है।
भारत सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय दृष्टिविहीनता कार्यक्रम के अंतर्गत जिला अस्पताल में रोगियों का नेत्र परीक्षण किया जाता है। नेत्र सर्जन ऐसे मरीजों को चयनित कर उन्हें ऑपरेशन की सलाह देकर उनका ऑपरेशन भी करते हैं। चिकित्सकों के मुताबिक सफेद और काला मोतिया का ऑपरेशन हो सकता है, जबकि काला मोतिया बिंद मरीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता के अनुसार कभी-कभी दवाओं से भी कवर हो जाता है। मरीजों जगपाल, रामवती, कुंवरकली, जैनब खातून तथा रुबिना आदि ने बताया कि उम्र और गरीबी के कारण मेरठ जाने में काफी कठिनाई होंगी। मरीजों ने जिला अस्पताल में ही उनका ऑपरेशन कराने की मांग की है। करीब आठ माह से एक भी ऑपरेशन मोतियाबिंद का नहीं हुआ है, जिला अस्पताल के नेत्र रोग विशेषज्ञ एवं सर्जन डा. सुशील कुमार ने बताया कि दवाइयां अस्पताल में उपलब्ध नहीं होने के कारण ऑपरेशन नहीं हो पा रहे हैं। उन्होंने कई बार मुख्य चिकित्साधिकारी को इस बारे में लिखित और मौखिक रूप से कई बार अवगत कराया है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
सीएमओ डा. राकेश मित्तल ने बताया कि जिला अस्पताल में दवाइयां खरीदने के लिए अभी टेंडर नहीं हो पाया है। कई बार इसके लिए शासन को चिट्ठी भी भेज दी गई है।
मोतियाबिंद के लक्षण और बचाव
1. यदि 40 वर्ष की उम्र के बाद धुंधला दिखाई देने लगे तो यह मोतियाबिंद हो सकता है।
2. उपचार के लिए शीघ्र ही डाक्टर को दिखाएं।
3. इसका ऑपरेशन सुरक्षित और आसान है।
4. चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही नियमित रूप से आंखों में दवा डालें।
5. जांच करवाने और चश्मे का नंबर लेने के लिए 4-6 सप्ताह के बाद डाक्टर के पास जाएं।
6. बिना डाक्टर की सलाह के आंखों में कोई दवा न डालें।
7. आंख चोट लगने तथा डाइबिटीज के कारण भी मोतिया हो सकता है।