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चिंताजनक: जिले में हर दूसरी गर्भवती महिला में खून की कमी

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जिले में हर दूसरी गर्भवती महिला में खून की कमी है। शरीर में खून की कमी होने से महिलाएं कई गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाती हैं। प्रसव के दौरान लापरवाही बरतने पर प्रसूता की मौत भी हो जाती है। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, इस साल 33 हजार गर्भवती महिलाओं की जांच की गई, जिसमें 18044 महिलाओं में 11 ग्राम प्रति डेसीलीटर से भी कम खून मिला। वहीं 540 महिलाओं में सात डेसीलीटर खून पाया गया। विशेषज्ञ के मुताबिक, गर्भवती महिलाओं के शरीर में औसतन 12 से 14 ग्राम खून रहना चाहिए। खून की कमी के पीछे लापरवाही सबसे बड़ा कारण है।
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आधी आबादी में एनीमिया (रक्ताल्पता) गंभीर समस्या है। जनपद में किशोरियां, गर्भवतियों से लेकर सामान्य महिलाएं तक इसकी चपेट में हैं। जिले की 50 प्रतिशत गर्भवती और 30 फीसदी सामान्य महिलाएं और करीब 20 फीसदी किशोरियां खून की कमी से जूझ रही हैं। पीएचसी, सीएचसी और जिला अस्पताल में रोजाना आने वाली महिलाओं में करीब 50 फीसदी महिलाएं एनीमिया से ग्रस्त रहती हैं। यह आलम तब है जब प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के अतिरिक्त एनीमिया के रोकथाम के लिए तमाम ऐसी योजनाएं संचालित हैं। गर्भवती महिलाओं का सुरक्षित प्रसव कराने के लिए संचालित तमाम योजनाओं की पोल नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट खोल रही है। जननी सुरक्षा योजना के तहत महिला को गर्भधारण से प्रसव होने तक छह हजार रुपये और राष्ट्रीय पोषण मिशन के तहत संतुलित पोषण आहार भी दिया जा रहा है। सरकारी अस्पतालों में हर माह जांच के लिए शिविर लगाए जा रहे हैं। फिर भी महिलाएं खून की कमी से जूझ रही है। जिले में 17 पीएचसी, एक जिला अस्पताल, छह सीएचसी और 206 उप स्वास्थ्य केंद्र है। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक जिनमें रोजाना 750 से अधिक महिलाएं विभिन्न रोगों से ग्रस्त होने पर उपचार कराने के लिए आती हैं। जिनमें से लगभग 175 गभर्वती, 115 सामान्य महिलाएं व 60 किशोरियां एनीमिया रोग से ग्रस्त होने के चलते उपचार करा रही हैं।


दुर्गागंज सीएचसी की महिला रोग डॉक्टर सीमा पंत ने बताया कि महिलाओं के शरीर में गर्भवास्था के दौरान में 12 से 14 ग्राम प्रति डेसीलीटर खून होना चाहिए। खून की कमी होने पर ऑपरेशन नहीं करवाना चाहिए। इससे जान जोखिम में पड़ सकता है। अस्पताल में जांच के दौरान तमाम गर्भवती महिलाओं में आठ ग्राम डेसीलीटर और कुछ में इससे भी कम खून रहता है। यह बेहद चिंताजनक है। खून की कमी गर्भवती के साथ गर्भ में पल रहे शिशु के लिए भी नुकसानदेह है। अक्सर प्रसव से पहले महिला को खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है।भदोही सीएचसी पर तैनात महिला रोग विशेषज्ञ डाॅ. शालिनी पाठक ने बताया कि बदलती जीवनशैली के साथ आहार संबंधी आदतों में होने वाला बदलाव से महिलाएं एनीमिया से ग्रस्त हो रही हैं। इनमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है। वहीं, गर्भावस्था में मौसमी हरी सब्जियां, फल, गुड़, चना, पालक, मेथी आदि का सेवन करें। मां के स्वस्थ होने से गर्भस्थ शिशु तंदुरुस्त होगा। रक्त की कमी से बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होता है। इसका असर उस पर उम्र भर रहता है। इसलिए समय रहते सतर्कता बरतने की आवश्यकता है।
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