ज्ञानपुर। जिले के 33 उच्चीकृत राजकीय हाईस्कूल में शिक्षकों और प्रवक्ताओं में 40 से 45 फीसदी से अधिक शिक्षकों, प्रवक्ताओं के पद रिक्त चल रहे हैं। इससे पठन-पाठन प्रभावित है। छात्र-छात्राओं को बेहतर शिक्षा नहीं मिल पा रही है। जिले के 183 माध्यमिक और इंटर कॉलेजों में 38 राजकीय, 25 वित्तपोषित और 120 वित्तविहीन शामिल हैं। इसमें करीब एक लाख छात्र-छात्राएं नौवीं से 12वीं तक की शिक्षा ग्रहण करते हैं। स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, स्कूलों की स्थिति में बदलाव के लिए तमाम बातेें की जाती हैं, लेकिन धरातल पर राजकीय स्कूलों की दशा काफी खराब है। 33 राजकीय माध्यमिक विद्यालय और पांच इंटर कॉलेज हैं। इसमें सहायक अध्यापकों के 304 पद सृजित हैं। 176 सहायक अध्यापक तैनात हैं जबकि 128 रिक्त हैं। प्रवक्ताओं की संख्या तो और भी खराब है। सृजित 69 पदों में मात्र 20 मौजूद हैं जबकि 49 रिक्त है। शिक्षकों की कमी के कारण छात्र-छात्राओं को विषयवार शिक्षा देना कॉलेज प्रशासन के लिए चुनौती बनी रहती है। सालों से बनी शिक्षकों की कमी अब तक पूरी नहीं हो सकी। जिले के सबसे पुराने कॉलेजों में शामिल विभूति नारायण राजकीय इंटर कॉलेज की हालत काफी चिंताजनक है। यहां शिक्षकों और प्रवक्ताओं के 60 से अधिक पद सृजित हैं, लेकिन वर्तमान में 25 के ही करीब पढ़ा रहे हैं। बेहतर शिक्षा, अनुशासन संग अन्य व्यवस्थाओं के लिए कभी पूर्वांचल में अपनी छाप छोड़ने वाला यह कॉलेज आज शिक्षकों और प्रवक्ताओं की कमी से जूझ रहा है। एक दशक पूर्व यहां प्रवक्ताओं और शिक्षकों की अच्छी खासी संख्या रहती थी, लेकिन हर साल तीन से चार शिक्षक और प्रवक्ता सेवानिवृत्त हो गए। कुछ प्रवक्ताओं को राजकीय माध्यमिक स्कूलों में प्रधानाचार्य बनाकर भेज दिया गया। उनके स्थान पर दूसरी नियुक्ति न होने से समस्या बढ़ती गई। जिले के राजकीय हाईस्कूल में शिक्षकों और प्रवक्ताओं की कमी से शिक्षा छात्र संख्या में भी गिरावट आने लगी है। 2020 में 33 राजकीय हाईस्कूल में छात्र-छात्राओं की संख्या जहां 3580 रही वहीं 2021 में 3122 होगई। 2022 में पूर्व में पंजीकरण के आधार पर 2800 ही पहुंच सकी है। 10 अक्तूूबर को पंजीकरण की तिथि समाप्त होने पर भी 100 से 150 ही छात्र- छात्राएं बढ़ सकते हैं। डीआईओएस एनएल गुप्ता ने बताया कि प्रवक्ताओं और शिक्षकों के रिक्त पदों का ब्यौरा हर साल निदेशालय भेजा जाता है। वहीं से शिक्षकों की नियुक्ति होनी है। शिक्षकों की कमी से पठन-पाठन पर प्रभाव पड़ता है।