अमेरिका से ट्रेड डील, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) होने के बाद भारतीय कालीन उद्योग को काफी हद तक राहत मिली है। अभी भी तुर्किये का भारतीय उत्पादों पर 45 प्रतिशत टैरिफ कालीन उद्योग पर भारी पड़ रहा है। अगर भारत तुर्किये पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाए तो तुर्किये के रूप में भारत को 3500 करोड़ का बाजार मिल सकता है। अमेरिका भारतीय कालीन का सबसे बड़ा खरीदार है इसलिए अमेरिका ट्रेड डील को कालीन उद्योग के लिए सर्वाधिक लाभप्रद बताया जा रहा है। नगर के कालीन उद्यमी मानते हैं कि भारत की ओर से तुर्किए पर रेसिप्रोकल टैरिफ नहीं लगाए जाने से तुर्किये के कालीन धड़ल्ले से भारत आ रहे हैं। उनके भारी भरकम टैरिफ के चलते भारतीय कालीन का तुर्किये को निर्यात लगभग समाप्त होने के कगार पर पहुंच गया है। उद्यमी बताते हैं कि तुर्किये में मशीन से गलीचा बनता है। इसमें से 20 प्रतिशत तक भारत आयात कर रहा है।
एक समय था जब हस्तनिर्मित कालीन की पूर्ति के लिए तुर्किये भारत पर निर्भर था। भारत के कुल निर्यात का 20 प्रतिशत लगभग 3500 करोड़ के हैंडनाटेड कालीन आयात करते थे। वर्ष 2015 में तुर्किये ने भारतीय कालीन पर 85 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया था। जो आज धीरे धीरे कम होकर 45 प्रतिशत पर आकर टिका है। कालीन निर्यात संवर्धन परिषद (सीईपीसी) के प्रशासनिक समिति के सदस्य संजय गुप्ता बताते हैं कि तुर्किये माल भेजने में अन्य खर्चें मिलाकर कुल 60 प्रतिशत तक अतिरिक्त खर्च होने से तुर्किये का बाजार भारत के उद्यमियों के लिए लगभग शून्य हो चुका है। ऐसे में लोगों का मानना है कि तुर्किये पर भारत को रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने से तुर्किए टैरिफ की दरों कम कर सकता है। इसका लाभ भारतीय कालीन उद्योग को मिल सकता है। असलम महबूब, उपाध्यक्ष सीईपीसी ने कहा कि भारतीय कालीन उत्पादों पर तुर्किये में 45 प्रतिशत टैरिफ है। इससे हमारे लिए तुर्किये का बाजार लगभग खत्म हो चुका है। तुर्किए के मशीन वाले कालीन आज भी 20 प्रतिशत टैरिफ पर भारत आ रहे हैं। संजय गुप्ता, सदस्य प्रशासनिक समिति सीईपीसी ने कहा कि भारत यदि तुर्किये पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाए तो आज भी तुर्किये भारतीय हैंड नाटेड कालीन के लिए बड़ा बाजार है। इसके लिए भारत सरकार को सोचना चाहिए।