विदेश जाने वाली भदोही की हस्तनिर्मित कालीन को पांच चरणों की कसौटी पर खरा उतरना होता है। भारतीय कालीन प्रौद्योगिक संस्थान (आईआईसीटी) के नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लैबोरेटरीज (एनएबीएल) की प्रमाणित लैब में कालीन के रॉ मेटेरियल के अलावा कालीन के सैंपल और पूरे कालीन की टेस्टिंग की जाती है। एनएबीएल की ओर प्रमाणित आईआईसीटी का प्रमाण पत्र मिलने के बाद ही कालीन को विदेश में भेजा जाता है। हर साल आईआईसीटी से निकलने वाले नए-नए छात्र कालीन उद्योग में अपनी पैठ बना रहे हैं। प्रशिक्षित छात्रों के नए-नए प्रयोगों से उद्योग में बीते 10 साल में काफी परिवर्तन भी आए हैं।
आगामी चार अक्तूबर से भदोही में 50वां इंडिया कारपेट एक्स्पो की शुरूआत हो रही है। आईआईसीटी के रसायन विभाग के विभागध्यक्ष दीपांकर जना ने बताया कि बीते 10 साल में कालीन उद्योग ने काफी परिवर्तन आए हैं। खास तौर पर क्वालिटी, डिजाइन और सुरक्षा के क्षेत्र में आयातक अब किसी तरह का समझौता नहीं कर रहा है। जिसके कारण कोई भी कालीन अगर अमेरिका, यूरोप या फिर किसी अन्य देश में जाती है तो उसे कम से कम चार से पांच चरणों की कटौती पर खरा उतरना होता है। बताया कि कालीन में अलग-अलग तरह के डिजाइन बनते हैं। डिजाइन अगर एक-दूसरे कालीन से मेल नहीं खाते तो वह फेल हो सकते हैं। इसके अलावा यार्न की क्वालिटी अच्छी न हो और यार्न के रंग में अगर स्कीन कैंसर जैसी बीमारियों के तत्व हैं तो उसे भी फेल कर दिया जाता है। कालीन अक्सर इंडोर में बिछाए जाते हैं। घर, होटल और बड़े-बड़े एयरपोर्ट के अलावा सरकारी भवनों में आग लगने की स्थिति में वह अगर आग फैलाने वाला रहेगा तो विदेशाें में इसे स्वीकार्य नहीं किया जाएगा।
कालीन में ऊलेन का कितना प्रयोग, यह बताएगा कालीन लेबल
आईआईसीटी की ओर से ही तैयार किया गया कालीन लेबल भारतीय कालीन की गुणवत्ता को बताने का काम करेगा। इसके माध्यम से न सिर्फ कालीन में ऊलेन की गुणवत्ता की जानकारी मिल सकेगी, बल्कि कालीन में कितना प्रतिशत ऊन का इस्तेमाल हुआ है। इसको प्रमाणित करने का काम करेगा। आईआईसीटी निदेशक डॉ. राजीव वाष्णेय ने बताया कि लेबल पर लगे क्यूआर कोड को स्कैन करने पर कालीन की गुणवत्ता और ऊन कितना प्रतिशत इस्तेमाल किया गया है। उसके बारे में बताएगा। बताया कि इसको भारतीय वस्त्र मंत्रालय की पहल पर आईआईसीटी बीते ढाई सालों काम कर रही है। अब यह अंतिम चरण में है।
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हर साल 25 कुशल युवा कालीन उद्योग में पा रहे रोजगार
डॉ. राजीव ने बताया कि आईआईसीटी कालीन उद्योग या टेक्सटाइल उद्योग में हुए बदलावों के अनुसार नई जनरेशन को प्रशिक्षित करने का काम कर रही है। संस्थान में बच्चों को न सिर्फ बीटेक डिग्री, बल्कि एक कुशल प्रशिक्षण दिया जाता है। जिसके माध्यम से बच्चे कालीन उद्योग में आए बदलावों को समझ सके और समय के साथ अपने आपको भी उसमे ढाल सके। बताया कि हर साल संस्थान से निकलने वाले 25 युवा जिले के ही कालीन निर्यातकों के यहां अच्छी नौकरी प्राप्त करते हैं। शेष देश के अन्य हिस्सों और विदेशों में भी नौकरी कर रहे हैं। वहां वे न सिर्फ अपनी समझ से एक बेहतर क्वालिटी व डिजाइन को बनाते हैं, बल्कि देश दुनिया में हो रहे परिवर्तन के अनुसार उद्योग में भी काम करते हैं। बताया कि कुशल कारीगरों के लिए आईआईसीटी समय-समय पर काम कर रहे बुनकरों को भी प्रशिक्षित कर रहा है।
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किस-किस स्तर पर होती है कालीन की जांच
-बायर को दिखाई गई यार्न की क्वालिटी के स्तर की जांच
-बॉयर के अनुसार फाइनल डिजाइन का मिलान
-कालीन के धागों में प्रयोग किए गए धागों कलर के केमिकल की जांच
-पर्यावरण संंबंधी किसी भी स्तर के नुकसान न पहुंचाने की जांच
-16 सीएफआर : आग लगने के बाद आग को एडजस्ट करने वाला हो।
नोट - अलग-अलग जांच के लिए निर्धारित शुल्क देना होता है, जो 2000 से लेकर 45000 तक निर्धारित है। सबसे महंगा फायर एडजस्ट वाली जांच होती है।
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इतने प्रकार के होते हैं यार्न
-उलेन यार्न
-सिल्क यार्न
-फाइबर यार्न
-जूट यार्न
-सूती यार्न
-पेट यार्न