मोढ़ के कोछिया में दुलर्भ प्रजाति के बार्न उल्लू के जोड़े को दिखाते मुन्नर राम यादव।
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मोढ़। जिले के कोछिया गांव में शनिवार को दुर्लभ प्रजाति बार्न के दो उल्लू मिले। ग्रामीणों के अनुसार यह नर और मादा उल्लू का जोड़ा है। वन विभाग को सूचना दी गई है। कुछ दिन पूर्व इसी गांव में इसी प्रजाति का एक उल्लू मिला था।
सुरियावां ब्लॉक के कोछिया गांव निवासी मुन्नर राम यादव के घर के सामने सड़क पर दुर्लभ प्रजाति का बार्न उल्लू मिला। कुछ दिन पूर्व आलू के खेत में उल्लू मिला था। इस बार उल्लू का जोड़ा मिला है। ग्रामीणों ने जिलाधिकारी से मांग किया है कि इस बार पक्षी को सारनाथ स्थित चिड़ियाघर में पहुंचाया जाए अन्यथा इनकी जान बचनी मुश्किल हो जाएगी। दोनों उल्लू कुछ खा-पी नहीं रहे हैं। सफेद और नारंगी रंग के अनोखे पक्षी को देखने के लिए भीड़ जुट गई। वन्य अधिकारियों के अनुसार इस पक्षी को वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 के शेड्यूल तीन में स्थान दिया गया है। बार्न उल्लू की औसत आयु चार वर्ष होती है। कुछ मामलों में यह करीब 15 वर्ष तक जीवित रहते हैं।
पवित्र माना जाता है बार्न उल्लू
वन विभाग ज्ञानपुर रेंज के रेंजर रिचेश मिश्र का कहना है कि देश के विभिन्न भागों में बार्न उल्लू को पवित्र माना जाता है। स्वभाव से बार्न उल्लू शर्मिला और शांत होता है। इसकी आवाज सामान्य उल्लू के समान नहीं होती है। यह कृषक मित्र होने की वजह से रात में खलिहान में रुकता है। अनाज खाने के लिए आने वाले जंतुओं का शिकार करता है। यह फसलों को कीट पतंग से भी बचाता है। इस प्रजाति के उल्लू अक्सर जोड़े में रहते हैं। यह सूखी जगह, पुराने मकानों, खंडहर और किलो में निवास करते हैं। इनका भोजन मुख्य रूप से चूहे होते हैं। प्रतिवर्ष चार से सात चिकने गोलाकार अंडे देते हैं। ऐसी स्थिति में नर ही भोजन का प्रबंध करता है और मादा अंडो को सुरक्षित रखने का कार्य करती है।
यह होती है विशेषता
मोढ़। बार्न प्रजाति के उल्लू दुनिया में सबसे व्यापक पक्षी प्रजातियों में से एक होने की प्रतिष्ठा भी रखता है। इसकी अलग-अलग दिल के आकार की चेहरे की डिस्क है, साथ ही इसके लंबे पैर, लंबे ताल और छोटी, अंधेरे आंखें हैं। इसके अलावा, इसमें एक लंबी विंग अवधि होती है, और एक छोटी पूंछ जो कुछ हद तक एक वर्ग की तरह दिखाई देती है।