गोपीगंज। नगर के बाबा बड़े शिव मंदिर में आयोजित पुरुषोत्तम मास महात्म्य कथा के 18वें अध्याय में कथावाचक रत्नेश महाराज ने भगवान विष्णु की कृपा, पुत्र मोह के दुष्परिणाम व वैराग्य के महत्व वर्णन किया। बताया कि पुरुषोत्तम माह ईश्वर की साधना का प्रमुख मास है। इस माह में धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व होता है। बताया कि राजा दृढ़धन्वा ने महर्षि वाल्मीकि से अपने पूर्व जन्म का वृत्तांत सुनाने का आग्रह किया, तब वाल्मीकि मुनि ने बताया कि पूर्व जन्म में वह एक ब्राह्मण था, जो अपने बेटे के वियोग में दुःखी होकर एक माह तक निरंतर विलाप करता रहा। बताया कि इसी दौरान भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय पुरुषोत्तम मास चल रहा था। पुत्र शोक में डूबे ब्राह्मण ने न भोजन किया और न ही जल ग्रहण किया। अनजाने में ही उसका पूरा पुरुषोत्तम मास व्रत एवं साधना के समान व्यतीत हो गया। उसकी इस अवस्था से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान श्रीहरि प्रकट हुए और उसे आशीर्वाद देते हुए उसके मृत पुत्र को पुनर्जीवित कर दिया। मौके पर दीपक मोदनवाल, घनश्याम जायसवाल, कैलाश अग्रहरी, संजय केशरी आदि रहे।