व्रती महिलाओं ने विधि विधान पूर्वक पूजन की शुरूआत कर दिया। चार दिनों तक चलने वाले पूजा जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में होती है।
गोपीगंज के रामपुर गंगा घाट, सीतामढ़ी घाट, ज्ञानपुर नगर के ज्ञानसरोवर के अलावा अन्य छोटे सरोवरों में छठ पूजा की तैयारी शुरू हो गई है।
आस्था का महापर्व नहाय-खाय के साथ शुरू हुआ। लोगों ने घरों की सफाई और स्नानादि करने के बाद व्रत का संकल्प लिया। खाने में लौकी की सब्जी और चने की दाल संग घी लगी रोटी खाई।
सोमवार को छोटी छठ होगी। खरना में 60 दिन में तैयार साठी धान के लाल चावलों से बना गुड़ का रसियाव और रोटी खाते हैं। मंगलवार को डूबते सूर्य और बुधवार को उगते सूर्य को अर्ध्य है।
पूजा में कोसी, सूप, शहद, काला तिल, पान का पत्ता, अदरक, हल्दी, नीबू, सुपारी, गन्ना, सुथनी, अनार, अनानास, नारियल, बेर, संतरा, इमली और शरीफा का इस्तेमाल होता है।
आटा और गुड़ से ठेकुआ और साठी के चावल के लड्डू संग पूड़ी भी बनाई जाती है। बांस की टोकरी-दउरा में सामग्री रखकर घाट पर जाकर छठ पूजा की जाती है।
पंडित लक्ष्मीशंकर तिवारी ने बताया कि सूर्य देव सभी ग्रहों के अधिपति कहे जाते हैं, कार्तिक माह के षष्ठी तिथि को सूर्य की उपासना करना खास लाभकारी होता है।
सुहागिन महिलाएं परिवार व बच्चों के कल्याण के लिए निराजल व्रत रखती हैं। षष्ठी तिथि को डूबते सूर्य एवं सप्तमी तिथि को उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
सूर्य पुराण के अनुसार, सूर्य देव को केला फल प्रिय है। केले में लाल धागा बांधकर पूजन करना ज्यादा फलदायी होता है। इससे सूर्य देव प्रसन्न होते हैं। छठ पर्व पर तांबे के पात्र में डूबेत एवं उगते सूर्य को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है।
इसकी वैज्ञानिक महत्ता भी है, तांबे के पात्र एवं जल से टकराकर सूर्य की किरणें जब व्यक्ति के शरीर पर पड़ती हैं तो वह लाभकारी होता है। रोग को शोषण करने की क्षमता भी इसमें होती है।