मुख्य अतिथि सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य डा. राजकुमार पाठक ने बताया कि वैदिक और पौराणिक युगों से नारियां सशक्त थीं। दहेज और भ्रूण हत्या घटते लैंगिक अनुपात का कारण हैं।
उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका अहम हैं।
डा. सुरेश पांडेय मंजुल ने कविता के माध्यम से बखान करते हुए कहा कि छांव ममता का जब भी मिला मां का चेहरा प्रकट हो गया। डा.विद्यापति शुक्ला, विकास नारायण सिंह, राम गोपाल तिवारी, कैलाशनाथ गौतम, शिवचंद्र यादव, सुनील सिंह के अलावा छात्रा अर्चना सिंह, हरीप्रिया मौर्य, प्रीति सोनकर, प्रतिभा, लोकभद्र सिंह ने भी विचार व्यक्त किए।