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प्रवासियों की आपबीति

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भदोही। सूरत से लौटे प्रवासी किशन कनौजिया के लिए लाकडाउन के दो महीने बेहद मुश्किल से बीते। उनकी मुख्य परेशानी यह थी उनकी पत्नी और बच्चे भी साथ थे। बताया कि रूखी-सूखी खाकर वे तो बिता सकते थे लेकिन बच्चों और परिवार के लिए सोचना पड़ता था। जब जेब में रुपये समाप्त हो गए तो वहां अपने एक मित्र से 6 हजार रुपये लेकर ट्रक से भदोही लौट आए।
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रामपुर सर्रोई निवासी किशन कनौजिया का कपड़े इस्त्री का काम चल निकला था। इस बीच आवश्यकता महसूस होने पर पत्नी और बच्चों को भी सूरत लेकर चले गए। भाड़े पर मकान भी ले लिया और खर्च भी बढ़ गया। लेकिन लाकडाऊन होते ही गहरा धक्का लगा। काम एकाएक बंद हो जाने से आमदनी ठप हो गया। दो महीनों तक परिवार की गाड़ी किसी तरह खीच कर चलाता रहा। जब प्रतीत हुआ कि लाकडाऊन लंबा चलेगा तो घर लौटने का निर्णय लिया। तब तक जेब खाली हो चुका था। एक मित्र से 6 हजार रुपये उधार लेकर ट्रक से परिवार को लेकर घर आया। 14 दिन क्वारंटीन बिता चुका हूं।
रामपुर गांव के ही बच्चे लाल यादव मुंबई में डेयरी उत्पादक के यहां पगार पर काम कर करते थे। जब लाकडाऊन हुआ तो डेयरी संचालक ने हांथ खड़े कर दिए और मुझे जवाब दे दिया। जबकि प्रधानमंत्री ने बार बार कहा कि जो लोग जहां हैं वहीं रहें उन्हें पूरा सहयोग मिलेगा। हाल यह हो गया कि पगार पर काम करने वाले कितने दिन वहां टिक पाता। जेब में कुछ पैसे बचे थे तभी से घर लौटने की कवायद में लग गया। इस बीच पूर्वांचल की ओर आ रही एक ट्रक वाले को 35 सौ रुपये भाड़ा देकर भदोही चला आया। कहा कि मेरी प्रधानमंत्री से प्रार्थना है कि लौट रहे प्रवासियों के रोजगार की व्यवस्था न की गई तो हम लोग आत्महत्या करने को मजबूर हो जाएंगे। हम लोग कर्ज तले डूबते जा रहे हैं। इस दल-दल से निकालने की गुहार लगाई।
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