भदोही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकल, वोकल और ग्लोबल के अर्थशास्त्र से कालीन उद्योग असमंजस में पड़ गया है। स्थितियां पूरी तरह स्पष्ट न हो पाने के कारण विदेशी बाजार पर निर्भर कारपेट इंडस्ट्री में नई चुनौतियों के उठने की आशंका खड़ी हो गई है।
भदोही में चार सौ साल से अधिक पुरानी कालीन बुनाई की विरासत अब लगभग छह हजार करोड़ के कारोबार का रूप ले चुकी है। देशभर के कुल निर्यात का लगभग 60 फीसदी हिस्सा अकेले भदोही परिक्षेत्र के जिम्मे आता है। लेकिन, जब से लॉकडाउन शुरू हुआ है, इस उद्योग की हालत पतली हो चली है। दो हजार करोड़ से अधिक का तैयार माल विभिन्न कारखानों और गोदामों में डंप पड़ा है। अमेरिका, यूरोप समेत दुनिया के अन्य देशों में कोरोना संक्रमण के चलते बंद हुए बाजार से चिंतित कारोबारी इसके खुलने का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में लोकल उत्पाद के लिए स्थानीय स्तर पर ही बाजार तैयार करने की कोशिश से जुड़े प्रधानमंत्री का वक्तव्य सामने आने के बाद कालीन उद्यमियों की पेशानी पर बल पड़ गया है। कालीन उद्यम से जुड़े सुमित सिंह कहते हैं कि नई अवधारणा को अभी ठीक से समझने की जरूरत है। कालीन कारोबार के लिए स्थानीय स्तर पर कोई बाजार नहीं है। सुरेश मिश्र कहते हैं कि या तो सरकार देश के अन्य हिस्सों में इसके लिए बाजार तैयार कराए, नहीं तो उद्योग पर असर पड़ सकता है।