पृथ्वी को हरा भरा बनाने के लिए हर साल वन संरक्षण को लेकर शासन से लेकर प्रशासन की ओर से भले ही तमाम प्रयास हो लेकिन हकीकत इसके विपरीत ही है। वन माफियाओं की सक्रियता और विकास के नाम पर पेड़ों की हो रही कटाई से हरियाली पर संकट बढ़ती जा रही है। साल दर साल हजारों पौधे रोपे जाने के बाद भी हर तरफ धूल उड़ रही है।
आधुनिकता की चमक-दमक में बढ़ते नगरीकरण और बढ़ती जनसंख्या के चलते वन क्षेत्र का दायरा सिमटता जा रहा है। जिन इलाकों में कभी बड़े-बड़े बगीचे या वन क्षेत्र रहा करते थे, वहां अब बस्ती और कालोनियां बस गईं हैं। पौधों की कटान होने से स्थिति दिन ब दिन भयावह होती जा रही है। पर्यावरण का संतुलन बनाने के लिए पौधों का होना जरूरी है। इसके लिए सरकार योजनाओं के माध्यम से हर साल लाखों रुपये खर्च कर रही है। वन विभाग की ओर से जुलाई से सितंबर तक अभियान चलाकर पौधरोपण कराया जाता है, लेकिन संरक्षण न होने से ज्यादातर पौधे सूख जाते हैं। रही सही कसर वन माफियाओं की सक्रियता पूरी कर दे रही है। सीमावर्ती इलाकों में हरे पेड़ों की अवैध कटाई पर भी पुलिस और वन विभाग अंकुश लगाने में सफल नहीं हो सकी। विभागीय आंकड़ों पर गौर किया जाए तो गत 10 वर्षों में करीब छह लाख पौधे रोपे गए, इसमेें 10 फीसदी भी पौधे नहीं बचे। पर्यावरणविद डॉ. कमाल अहमद सिद्दीकी ने कहा कि पेड़ों की कटाई से लगातार मौसम में बदलाव हो रहा है। मानव जानते हुए भी पर्यावरण का क्षरण कर रहा है। इसको बचाने की जरूरत है अन्यथा भविष्य काफी भयावह होगा।
प्रभागीय वनाधिकारी मनीष सिंह ने कहा कि विभागीय स्तर से हर साल पौधरोपण कराया जाता है। विभाग के अलावा आम नागरिक भी इसके संरक्षण में सहयोग करें ताकि ज्यादा से ज्यादा पौधे बच सकें।