इस प्रशिक्षण का मुख्य ध्येय था कि हमारे कालीनों में भारतीय परंपराओं का इस्तेमाल बढ़े। तीन माह में प्रशिक्षुओं को अजंता, ह़ड़प्पा और मुगलकालीन मोटिफ्स आदि से रूबरू कराया गया।
इस अवसर पर आयोजित समारोह में निदेशक प्रो.केके गोस्वामी ने कहा कि आप अपनी मेहनत का उपयोग भारतीय कालीनों के विकास में करें। इससे आपका भी विकास होगा।
उन्होंने कहा ऐसे समय आपके विकास की अधिक संभावनाएं हैं जब केंद्र और प्रदेश सरकारें मेक इन इंडिया व मेक इन यूपी का नारा दे रही हैं।
कहा कि ऐसे डिजाइन विकसित करें जो एक नजर में पसंद आ जाएं। हम चाहते हैं प्रशिक्षु यहां से सीख कर, अपना विकास और संस्थान का नाम करें। बायर रिप्रेंजेटेटिव्स एसोसिएशन के सचिव रामजी मिश्र ने कहा कि कुछ ऐसा करें कि उसमें आपका नाम हो।
डिजाइनिंग का कोई अंत नहीं है। आपकी डिजाइन कब पसंद आ जाए कोई नहीं जानता। उपनिदेशक (हस्तशिल्प) डीपी सिंह ने कहा कि वस्त्र मंत्रालय युवाओं के लिए तमाम अवसर पैदा कर रहा है। हमारा उद्देश्य है कि आप डिजाइनिंग में निपुणता हासिल कर अपना विकास करें। आवश्यक नहीं है कि आप नौकरी ही करें। अपना डिजाइन बैंक भी स्थापित कर सकते हैं।
परियोजना समन्वयक आर.कर्माकर ने बताया कि प्रवेश परीक्षा के माध्यम से इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए कुल 40 युवाओं को चयनित किया गया था। कार्यक्रम को एसके पांडेय, प्रो.एसके पाल ने भी संबोधित किया। संचालन बीडी गुप्ता ने किया।