ज्ञानपुर। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत योजना के बेहतर संचालन में सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी बड़ा रोड़ा अटका रही है। इससे प्राइवेट अस्पतालों की चांदी कट रही है। जिला अस्पताल से लेकर सीएचसी और पीएचसी तक में अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी होने से लाभार्थियों को पैनल में शामिल 19 निजी अस्पतालों के साथ ही सूबे के अन्य बड़े अस्पतालों में जाना पड़ता है, जहां उनके आर्थिक शोषण की गुंजाइश बढ़ जाती है।
सरकार ने आयुष्मान योजना से गरीबों को पांच लाख तक का नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा तो दी, लेकिन जिलेवासियों को सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है। वजह सरकारी अस्पतालों में स्पेशलिस्ट नहीं हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि योजना में 3213 लाभार्थियों ने विभिन्न बीमारियों का उपचार कराया, जिनमें सरकारी अस्पतालों में इलाज करने वालों की संख्या महज 19 रही। आंखों के ऑपरेशन को छोड़ दिया जाए तो सरकारी अस्पतालों में अन्य दूसरे ऑपरेशन करने के लिए विशेषज्ञ नहीं हैं। वहीं दूसरी ओर प्राइवेट अस्पतालों में उपचार कराने वालों की संख्या 3194 है, जो 98 से 99 फीसदी है। योजना में महाराजा चेत सिंह जिला अस्पताल, महाराजा बलवंत सिंह अस्पताल भदोही को शामिल किया गया है। एक साल पूर्व शुरू योजना का उद्देश्य गरीब परिवारों को पांच लाख तक का मुफ्त इलाज देना है। इसके लिए वर्ष 2011 की आर्थिक एवं सामाजिक जनगणना के आधार पर जिले में करीब 94 हजार 867 पात्रों का चयन किया गया। सरकारी अस्पतालों की बात करें तो यहां डॉक्टरों का भारी टोटा है। वर्तमान में जिला अस्पताल में ईएनटी, कार्डियोलॉजिस्ट, सर्जन, एनेस्थिसिया, हड्डी रोग विशेषज्ञ समेत अन्य स्पेशलिस्टों की लंबे समय से कमी चल रही है। इसलिए गोल्डन कार्ड होने के बाद भी गंभीर मरीजों को यहां इलाज कराना संभव नहीं हो पा रहा है, जबकि प्राइवेट अस्पतालों में पर्याप्त संख्या में विशेषज्ञ हैं। आयुष्मान योजना के नोडल सूचना आशीष कुमार ने भी माना कि सरकारी के मुकाबले प्राइवेट हॉस्पिटलों में इलाज कराना लोग अच्छा समझते हैं। क्योंकि सरकारी अस्पतालों में निजी हॉस्पिटलों की अपेक्षा संसाधनों का अभाव है। सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी है। इससे ऑपरेशन के गंभीर और बड़े मामले लेने से अस्पताल इंकार कर देते हैं। इसके चलते गंभीर मरीजों को या तो जनपद से बाहर रास्ता देखना पड़ता है या फिर निजी अस्पतालों से समझौता करना पड़ रहा है।
योजना से जुड़े सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पताल मरीजों को इलाज की नि:शुल्क सुविधा मिल रही है। कुछ बीमारी ऐसी हैं, जो योजना में शामिल नहीं हैं। डॉक्टर यदि गोल्डन कार्ड होने के बाद भी लाभार्थियों को भर्ती नहीं कर रहे तो कार्रवाई की जाएगी।
डॉ. लक्ष्मी सिंह, सीएमओ
सामान्य परेशानी पर भी एडमिट करने का दबाव
निजी अस्पतालों में आयुष्मान योजना से पैसे कमाने की भूख अधिक है। यही वजह है कि सामान्य बीमारी की दशा में भी भर्ती होने की सलाह दे दी जाती है। भदोही नगर के निजी अस्पताल में पत्नी को लेकर भर्ती एक युवक बताया कि उसकी पत्नी को नॉर्मल डिलीवरी होने की उम्मीद थी, लेकिन डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने भर्ती करने का मशविरा दे दिया। जब उन्हें पता चला कि मरीज आयुष्मान कार्ड धारक है तो उन्होंने कहा कि तुरंत ही सर्जरी करना पड़ेगा, वरना हालत क्रिटिकल हो सकती। ऊपर से पैसे की भी मांग की।