ये दो केस स्टडी तो बानगी भर हैं। जिले में जायदाद और जमीन की वरासत कराने के लिए तैयार लोगों की फेहरिस्त काफी लंबी है। राजस्व विभाग की लापरवाही के आगे मुख्यमंत्री का निर्देश भी बेअसर हो चला है। शासन का निर्देश है कि मृत्यु होने पर तेरहवीं से पूर्व ही वरासत हो जानी चाहिए, लेकिन यहां कई साल से लोग तहसील और लेखपालों का चक्कर काट रहे हैं। इनमें ऐसे तमाम लोग भी शामिल हैं, जिन्हें इसकी जानकारी नहीं रहती।
मृत्यु के बाद वरासत की प्रक्रिया से जमीन और जायदाद के उत्तराधिकारी तय होते हैं। राजस्व विभाग समय-समय पर सर्वे कराकर स्वत: यह प्रक्रिया पूरी कराता है। लेकिन, जिले में ऐसे सैकड़ों मामले कई वर्ष से लंबित पड़े हैं, जिनमें मृत्यु के 15 से 20 साल बाद तक वरासत नहीं हुई। कतिपय मामलों में तो वरासत लेने वालों की भी मौत हो गई। जिले के ज्ञानपुर, भदोही, अभोली, डीघ, औराई और सुरियावां ब्लॉकों में बड़ी संख्या में लोगों की मौत के बाद उनकी जायदाद की वरासत नहीं हो पाई है। ज्यादातर ग्रामीणों को लेखपाल की जानकारी न होने के कारण वरासत का काम लटका रहता है। वरासत न होने से कई बार जायदाद को लेकर कानूनी पेच फंस जाता है। कई योजनाओं का लाभ लेने के लिए जमीन के अभिलेख जरूरी होते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार तहसीलदार को भी इस समस्या से अवगत कराया गया।
जनता दर्शन या फिर चौपाल आदि के दौरान समय-समय पर ऐसे मामले हमारे सामने आते हैं तो उन्हें प्राथमिकता के तौर पर दर्ज कराया जाता है। राजस्व विभाग को इस संदर्भ में निर्देश जारी किया गया है कि लेखपाल सप्ताह में एक दिन अपने क्षेत्र में जाएं और सर्वे कर वरासत दर्ज करें। वरासत के जो भी मामले लंबित पड़े हैं, उन्हें शीघ्र निपटाने के लिए निर्देश जारी किया जाएगा।
-प्रकाश बिंदु, जिलाधिकारी