भदोही। एक कालीन निर्यातक के लिए कालीनों की बुनाई के बाद बचे वेस्ट मटेरियल को डिस्पोज करना बड़ी चुनौती होता है। जयपुर रग्स ने इस बड़ी समस्या का समाधान कालीनों के रूप में ही निकाला। 45वें अंतरराष्ट्रीय मेले में शामिल होने आए जयपुर रग्स से सुमित ने बताया कि वेस्ट मटेरियल का उपयोग कर जयपुर रग्स की टीम ने कालीन बनाया, जिसका नाम रखा मनचाहा कालीन। सुमित बताते हैं कि इन कालीनों का नाम मनचाहा कालीन, इसलिए रखा गया, क्योंकि इसको बनाने के लिए बुनकरों को कंपनी की ओर से कोई डिजाइन नहीं दी जाती। बुनकर खुद की सोच से इसको डिजाइन करते हैं। उन्होंने बताया कि 2014 में कंपनी की ओर से मनचाहा प्रोडेक्ट की शुरूआत कालीन के वेस्ट मटेरियल को उपयोग करने के लिए किया गया। उन्होंने बताया कि कालीन का वेस्ट मटेरियलकंपनी के लिए सिरदर्द बना हुआ था। इसको देखते हुए कंपनी ने इनोवेशन करते हुए सभी वेस्ट मटेरियल को इकट्ठा कर उन्हें काम करने वाले कारीगरों के पास पहुंचा दिया जाता है। खास बात यह है कि इन कालीनों के लिए उन्हें कोई डिजाइन नहीं दी जाती। कालीन बुनकर खुद की सोच से वेस्ट मटेरियल द्वारा कालीन की बुनाई करते हैं। जिससे उनको रोजगार मिलने के साथ ही वेस्ट मटेरियल से पर्यावरण को होने वाले नुकसान का भी समाधान मिल सका। उन्होंने बताया कि मनचाहा कालीन बुनने वाले बुनकरों को कंपनी उनकी मांग पर उनके मेहनताना के अनुसार उपहार भी देती है।
फ्रीडम मनचाहा
ज्ञानपुर। सुमित ने बताया कि 2018 में कंपनी कैदियों की बुनी कालीन लेकर आई, जिसका नाम रखा फ्रीडम मनचाहा। कैदियों द्वारा बुनाई के कारण इसका नाम फ्रीडम मनचाहा रखा गया। उन्होंने बताया कि इसके पीछे कंपनी का उद्देश्य कैदियों को मुख्यधारा में शामिल करना और उनकी सोच को परिवर्तित करना है। उन्होंने बताया कि फ्रीडम मनचाहा कालीनें भी वेस्ट मटेरियल से तैयार होता है, लेकिन कैदियों द्वारा इसे बुने जाने क कारण इसका नाम फ्रीडम मनचाहा रखा गया है। जयपुर की जेल में लंबी सजा पाने वाले कैदियों को पहले बुनाई का प्रशिक्षण दिया जाता है। उन्हें मटेरियल उपलब्ध कराया जाता है। बताया कि फ्रीडम मनचाहा कालीनों से जो आय होती है उसका 75 फीसदी कैदियों को और 25 फीसदी कैदी के द्वारा प्रभावित परिवार को दिया जाता। इसके पीछे यह उद्देश्य है कि कैदी को उसकी गलती का अहसास हो। बताया कि इस इनोवेशन के लिए कंपनी को देश-विदेश में कई सम्मान मिल चुके हैं।