मेले की खास बात यह रही कि पहली बार सीधे शिल्पियों को अपने हांथ से बनाए उत्पाद प्रदर्शित करने का अवसर मिला। समापन समारोह में बोलते हुए निर्यातक, राजकुमार बोथरा ने कहा कि शिल्पियों को इस मेले से काफी अनुभव मिला होगा और संस्थान भी आगे से इस मेले को और बेहतर बनाने का प्रयास करेगी।
संस्थान की ओर से जारी विज्ञप्ति में बताया गया कि लगभग छह सौ निर्यातकों, कांट्रैक्टरों और व्यापारियों ने शिल्प मेले में सहभागिता की।राजकुमार बोथरा ने कहा कि अब केवल विदेशों में ही नहीं भारत में भी कालीनों की खपत जोर पकड़ रही है।
आप जैसे शिल्पियों को भारतीय बाजार को भुनानों पर जोर देना चाहिए। यह आपके लिए न केवल आसान बल्कि लाभप्रद भी होगा। निदेशक प्रो.केके गोस्वामी ने बताया कि भारत सरकार की मंशा है कि उसकी योजनाओं से सीधे बुनकर, मजदूर, शिल्पियों को लाभ होगा। आने वाले समय में कई योजनाएं तैयार हो रही हैं।
कहा कि भविष्य में इस प्रदर्शनी को और बेहतर बनाने के साथ इसमें बिक्री का विकल्प भी रखा जाएगा। समापन समारोह में भाग लेने वाले सभी शिल्पकारों के नि:शुल्क वेबसाइट बनाकर दी गई। यह भी आश्वस्त किया गया कि भविष्य में वे संस्थान से किसी भी प्रकार का सहयोग लेने के लिए आ सकते हैं।
समापन समारोह में आए विकास आयुक्त (हस्तशिल्प ), वाराणसी कार्यालय के प्रतिनिधि डीपी सिंह ने प्रतियोगियों को प्रमाण पत्र सहित दो दो हजार रुपये की सहभागिता राशि के डीडी सौंपे।
प्रतिभागियो ने कहा करअ इस मेले से उनका व्यापक उत्साहवर्धन हुआ है। भविष्य में और जोर-शोर से प्रतिभाग करेंगे। प्रो. बीडी दीक्षित ने कहा कि पूरे पांच दिन संस्थान ने छात्रों ने प्रदर्शनी में शिल्पियों की मदद की। इससे उन्हें भी अनुभव की पच्राप्ती हुई। उन्होंने सभी आगंतुरों का आभार जताया। डा.एसके पाल, डा.आर कर्माकर, डा. मोमिता बेरा, डा.अतनु मन्ना, एमए अंसारी, हिमांशु महापात्रा, मो.वसीम अंसारी छात्र-छात्राएं आदि उपस्थित थे I