आजादी के नायक...
अनेगपुर में अंग्रेजों के समानांतर लगती थी अदालत
क्रांतिकारी शिवदास दुबे ने अंग्रेजों के अत्याचारी कानून को दी चुनौती
अंत में अंग्रेजी सरकार ने भी स्वीकार की उनकी जनप्रियता
शमशाद हसन
चौरी।
बर्तानिया हुकूमत में जब गोरों की दासता भारतीयों के लिए किसी बुरे अनुभव से कम नहीं थी, उस समय भी आजादी के कुछ नायकों ने जबर्दस्त विरोध की मशाल जलाई। अंग्रेजों के जुल्म के आगे न सिर्फ पूरी दमदारी से खड़े हुए बल्कि लंबे समय तक उनकी ज्यादतियां और यातनाएं भी झेलते रहे। इन्हीं में से एक थे जिले के क्रांतिकारी शिवदास दुबे। उन्होंने अंग्रेजी कानून के विरोध में अंग्रेजी सरकार के समानांतर कानून और अदालत चलाईं। जेल भी बनाया, जिसमें फैसले के बाद बंदियों को रखा जाता था। खास बात यह कि अंत में अंग्रेजी सरकार ने भी उनके कानून को स्वीकार करते हुए उन्हें सम्मान दिया।
भदोही जिले के चौरी क्षेत्र के अनेगपुर गांव में 19वीं सदी में अंग्रेजी सरकार से इतर समानांतर कानून चलता था। हर छोटे-बड़े मामलों के फैसले यहीं पर सुनाए जाते थे और यहीं पर अपराधियों को बंदी बनाकर जेल में रखा जाता था। अंग्रेजों के अत्याचारी कानून को चुनौती देने वाले अनेगपुर गांव निवासी शिवदास दुबे की छठी पीढ़ी के वंशज राजन दुबे बताते हैं कि अंग्रेजों के कानून से भारतीयों को न्याय मिलना कठिन हो गया था। असह्य यातना अलग से मिलती थी। इस समय तक अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बगावत की आग देशभर में फैल रही थी। 1870 के आसपास शिवदास दुबे भी स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने अपने कानून के जरिए मानवीय आधार पर लोगों को न्याय देना शुरू किया। उनके इस कानून की जानकारी जब अंग्रेजी हुकूमत को हुई तो मिर्जापुर मुख्यालय से अधिकारी जांच के लिए रवाना हुए। अधिकारियों की आने भनक लगते ही निजी कानून के सभी कागजात जला दिए गए। अधिकारी जब तक मोरवा नदी के पास पहुंचते मल्लाहों ने भी अपनी नाव पानी में डुबा दी ताकि वे न पहुंच सकें। बाद में किसी तरह पहुंचे अधिकारियों को जांच पड़ताल में कुछ नहीं मिला। फिर भी अंग्रेज मानने को तैयार नहीं थे। अंग्रेजों की कार्रवाई से क्रांतिकारी शिवदास दुबे की लोकप्रियता बढ़ने लगी। बाद में उनको मिर्जापुर में तलब किया गया। वहां पर शिवदास दुबे को अंग्रेजी हुकूमत ने सम्मान के साथ कुर्सी पर बैठाया। उनकी जनप्रियता को देखते हुए अंग्रेजी हुकूमत ने मिर्जापुर की अदालत में होने वाले हर फैसले में शिवदास दुबे की राय लेने की मंजूरी दे दी।