मिर्जापुर। जिले में पिछले पांच वर्षों में विभिन्न सरकारी अभियानों के तहत ढाई करोड़ से ज्यादा पौधे रोपे गए हैं, लेकिन वह जमीन पर नदारद हैं। यही नहीं भाजपा महासचिव अरुण सिंह और विधायक रमाशंकर पटेल के लगाए गए पाैधे भी सूख गए हैं।
पर्यावरण संरक्षण और हरित आवरण बढ़ाने के उद्देश्य से हर वर्ष लाखों पौधे लगाने के लक्ष्य पूरे होने की घोषणाएं होती रहीं, मगर आज जिले में पांच वर्ष पुराने विकसित पेड़ों की संख्या इन दावों के अनुरूप नजर नहीं आती। ऐसे में पौधरोपण अभियानों की प्रभावशीलता, पौधों के संरक्षण और सरकारी निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
जिले में वन विभाग, ग्राम्य विकास, कृषि, उद्यान और राजस्व विभागों के सहयोग से बड़े पैमाने पर पौधरोपण हर साल कराए जाते हैं। वर्ष 2024 में जिले में 93 लाख से ज्यादा पौधे रोपे जाने का दावा किया गया था। वहीं वर्ष 2025 में ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत 93.32 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य था, जिसमें अकेले वन विभाग को 46.45 लाख पौधे रोपने की जिम्मेदारी दी गई थी। इससे पहले वर्ष 2020 से 2023 के बीच भी हर वर्ष 50 लाख से 70 लाख पौधे लगाने के लक्ष्य पूरे किए जाने की रिपोर्ट शासन को भेजी गई।
हालांकि, जिले की सड़कों के किनारे, ग्राम समाज की भूमि, पंचायत परिसरों, स्कूल, सामुदायिक शौचालयों, आरआरसी और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर पौधों का अस्तित्व मुश्किल है। कई स्थानों पर यह पहचानना भी कठिन है कि वहां कभी पौधरोपण हुआ था। ग्रामीणों का कहना है कि रोपण के समय कार्यक्रम होते हैं, रिपोर्ट तैयार की जाती है, लेकिन बाद में देखरेख नहीं की जाती। जानकारों का कहना है कि किसी भी पौधरोपण अभियानकी सफलता केवल पौधे लगाने से नहीं, बल्कि उनके जीवित रहने की दर (सर्वाइवल रेट) से तय होती है। सिंचाई, ट्री-गार्ड, पशुओं से सुरक्षा और नियमित निगरानी के अभाव में बड़ी संख्या में पौधे शुरुआती वर्षों में ही नष्ट हो जाते हैं।